157 23.4.1939 बाड़ों में बंद रहने वाले जानवरों से रियासतों के लोगों की स्थिति अलग नहीं - लोणंद (फलटण) - Page 256

235

संपूर्ण सत्ता होती है तब वे प्रजा का जितना कल्याण कर सकते हैं उतना कल्याण जनतंत्र के नाम पर ये मारवाड़ी और गूजर पैसों के बल पर मत खरीद कर नहीं कर सकते।

यहां के राजा बहुत सुज्ञ, समझदार हैं। पेंशन लेकर रियासत को खालिसा करने से इनकार नहीं करेंगे, ऐसा मुझे लगता है। उल्टे, मेरी सूचना मानने में उन्हें कोई अड़चन महसूस नहीं होगी। इस रियासत की जनसंख्या 58000 है और लगान केवल साढ़े पांच लाख रुपये ही आता है। मुंबई प्रांत की जनसंख्या दो करोड़ आय साढ़े बारह करोड़ है फिर भी 75 प्रतिशत गांवों में अब तक कोई स्कूल नहीं है। सो, ऐसे कम उत्पादन वाली रियासत को रखना यानी लगभग सूखे कुएं में कूदना है। फलटण रियासत का काम-काज पांच लाख रुपयों में कैसे संभव होगा? इसलिए अपनी रियासत वे अंग्रेजों के देश के साथ जोड़ें।

इस रियासत के अस्पृश्य माने गए लोगों को अपनी शिकायतें राजा के सामने रखने की छूट मिलनी चाहिए। प्रजा की रक्षा और उनके खान-पान के प्रबंध की जिम्मेदारी...... लेनी चाहिए। अस्पृश्यता के कारण जो लोग कोई रोजगार नहीं कर सकते, स्पृश्य माने गए लोग उन्हें अपने घर में बर्तन-फटका, कपड़ा धोना जैसे कामों के लिए भी काम पर नहीं रखते। ऐसे लोगों को अपनी रियासत की बंजर जमीन इस्तेमाल के लिए दें।

शिक्षा जैसे जरूरी काम के लिए भी जिस वर्ग के पास खर्च करने के लिए कुछ नहीं होता सरकार पट्ट, किताबें, वजीफे आदि देकर उनकी मदद करें।

इस रियासत के विधिमंडल में 19 लोग हैं। उनमें हमारे प्रतिनिधि को भी अवश्य शामिल करवा लें। पहले स्व. आयवले नामक व्यक्ति 1933 तक विधिमंडल में थे। उनकी मृत्यु के बाद किसी और को क्यों नहीं लिया गया समझ में नहीं आता। एक बार दिया हुआ अधिकार अगर लौटा लिया गया हो तो उसे वापिस जरूर मांग लें। इसी प्रकार, म्युनिसिपालिटियां, जिला बोर्ड आदि जगहों पर हमारे वर्ग के प्रतिनिधियों को लिया जाए।

आखिर एक कड़वा सच आपको बताए बगैर मुझसे रहा नहीं जा रहा। हमारे समाज में मृत जानवर का मांस खाने की अनिष्ट रूढि़ प्रचलित थी। यही रूढि़ हमारे समाज की अवनति का कारण बनी। इस अधम रूढि़ को हमें तुरंत बंद कर देना चाहिए। इस गंदगी का हम जब तक त्याग नहीं करेंगे तब तक समानता की लड़ाई लड़ने के लिए हम योग्य साबित नहीं होंगे। इसलिए इस रूढि़ को तुरंत बंद कर दें।

आखिर, सबने इक्ट्ठा होकर शांति से अपनी बात सुनी इसलिए सबको धन्यवाद देकर उन्होंने अपनी बात पूरी की। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच वह अपनी जगह जाकर बैठे।

इसके बाद कार्यक्रम में श्री भाऊसाहब गायकवाड़ ने कुल 5 प्रस्ताव परिषद के सामने रखे। दो अन्य लोगों ने उनकी बात का समर्थन किया और सबकी अनुमति से प्रस्ताव पारित किए गए।