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इस पार्टी में महारों की संख्या अधिक है। लेकिन मैं इसके लिए जिम्मेदार नहीं। महारों की जनसंख्या ही अधिक होने के कारण वे बड़ी संख्या में इस पार्टी में शामिल हुई हैं। चमारों से मैं नहीं कहता या मेरा उनसे आग्रह नहीं है कि वे मेरी पार्टी में शामिल हों। जिसे इस पार्टी के सिद्धांत पसंद आएं, जो इसके कार्यक्रमों से सह-समति रखेंगे वे सब अपने आप इसमें शामिल होंगे। इसका मुझे यकीन है। चमारों का अगर काँग्रेस में जाने का मन हो तो वे जरूर जाएं। लेकिन मैं उन्हें एक बात कहना चाहता हूं कि आज काँग्रेस में उनकी जो इज्जत है वह हमारे काँग्रेस में शामिल होने के बाद भी वैसे ही क्या रहेगी? मैं आज काँग्रेस से बाहर हूं इसलिए काँग्रेस उन्हें अपना रही है। काँग्रेस वाले मुझसे जलते हैं इसलिए वे आप पर प्रेम की चीनी बिखरते हैं। मेरे लिए काँग्रेस में जाना कोई बहुत कठिन काम नहीं है। अगर मैं काँग्रेस में शामिल हुआ तो आज जो काँग्रेस में शामिल हैं उनका क्या होगा यह तो सोचने की बात है। हममें से किसी एक को ही मंत्रीपद मिलता। आज सोनगावकर और तलकर काँग्रेस में शामिल तो हुए हैं लेकिन उनकी क्या हालत है? हाथ ऊपर करने के अलावा उनकी वहां कोई हैसियत नहीं है।
कुछ चमारों का मुझ पर आरोप है कि मैंने महारों को अधिक मात्रा में मतदान का अधिकार दिलाया है। क्योंकि महार जागीरदारों को मताधिकार मिला। लेकिन मैंने यह किया ऐसा कहना सरासर गलत होगा। ये बातें प्रांत सरकार की मर्जी के अनुसार हुई हैं। कितने प्रतिशत लोगों को मताधिकार देना है यह सरकार द्वारा तय किया गया। विभिन्न प्रांत सरकारों ने अलग-अलग तरीके सुझाए और उन पर अमल किया। इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। लेकिन इस बारे में मैं एक महत्वपूर्ण बात बताना चाहता हूं। मंबुई प्रांत में एक वरिष्ठ और एक कनिष्ठ इस प्रकार दो विधिमंडल हैं। वरिष्ठ विधिमंडल के मुंबई में कुल 350 मतदाता हैं। उनमें से करीब 300 मतदाता चमार हैं। और 50 महार हैं यानी महारों से करीब 6 गुना अधिक हैं चमार। महारों की जनसंख्या चमारों से कई गुना अधिक है। लेकिन मुझ पर आरोप करने वाले चमार नेताओं को महारों पर अन्याय हुआ है इस बात का अहसास क्यों नहीं हुआ? चमारों को अधिक मतदाता मिले इस बात से कभी हमको बुरा नहीं लगा। बुरा इस बात का लगता है अपने मतों के बल पर अगर चाहता तो चमार समाज अपना एक प्रतिनिधि वरिष्ठ विधिमंडल में भेज सकता था। लेकिन वे इतना सादा-आसान सा काम भी नहीं कर पाए। इतना ही नहीं हो एक चमार उम्मीदवार चुनावों में खड़ा था तो कुछ चमार नेताओं ने उसका विरोध कर एक और उम्मीदवार के लिए वोट जुटाने की कोशिश की। दूसरी बात यह कि अस्पृश्यों के आंदोलन में महार समाज ने मुख्य रूप से हिस्सा लिया, मेहनत उठाई यह बात निर्विवाद रूप से सच है। लेकिन ऐसा भी नहीं कि उसके सहारे उन्होंने अधिकार के पद हासिल किए या सरकारी नौकरियां पाई हों। उल्टे ‘आंदोलनकारी’ के रूप में समूची जाति पर ठप्पा लगा। पुराने विधिमंडल में था तब 1927 से नासिक के पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में