160 12.7.1939 कर बढ़ाकर होने वाली आय पर किसका हक? - मुंबई - Page 263

242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है। किसानों की इस बुरी हालत के बारे में क्या सरकार को सोचना नहीं चाहिए?

गांवों में रहने वाले लोगों को समय पर दवा नहीं मिल पाती और पर्याप्त पेयजल तक नहीं मिलता इस पर भी सरकार को आवश्यक सोचना होगा।

हम मुंबई शहर के बारे में सोचते हैं। इस शहर की जनसंख्या है 13,00,000 जिनमें से 6,00,000 कामगार हैं। कामगारों में बेकारी का अनुपात बहुत अधिक है। रात पाली बंद होने के कारण बेकारों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। ऐसे लोगों को काम देना या जीवन जीने के लिए जरूरी सामग्री मुहैया कराना सरकार का आद्य कर्तव्य है। हर उन्नत राष्ट्र में इस मसले पर यही सोचा जाता है। बेकार लोगों को सरकारी मदद पाने का हक पहुंचता है।

हमारे सामने बेहद आसान सवाल है। वह सवाल यह है कि कर बढ़ाकर जो 1,69,00,000 रु. जोड़ने वाली है उस पर किसका अधिकार है? अपने कमजोर मन के कारण आत्मघात करने वाले शराबियों का उस पर अधिकार है या अज्ञान में पिसने वाले बच्चे, ज्यादा लगान से हताश किसान, रोगों के शिकार बनते अज्ञानी लोग और सामाजिक अन्याय के कारण बेकार भूखों मरने वाले कामगारों का उस पर अधिकार है?

इस सवाल के लिए मेरा जवाब यह है कि शराबी अपनी करनी से दुख भोगता है। विभिन्न हकदार जब आगे आते हैं तब उनके सच-झूठ का फैसला करने का एक ही उपाय है और वह है- दुख निर्माण का कारण ढूंढना।

सामाजिक अन्याय के कारण दुख निर्माण हुआ है या अपने बुरे बर्ताव के कारण दुख निर्माण हुआ है इस पर फैसला देते समय जरूर विचार किया जाना चाहिए।

इसीलिए मुझे लगता है कि सामाजिक अन्याय के कारण दुखी लोगों को नजरंदाज कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाले लोगों की मदद के लिए तत्पर रहना सरकार की बहुत बड़ी गलती होगी।

अब शराब पर पाबंदी लगाने वाले कानून पर हम सोचें। शराब आयात करना, निर्यात करना, शराब की यातायात करना, उसे अपने पास रखना कानून अपरध है। लेकिन शराब पीकर मदहोश होने वालों का क्या? शराब पीने को ही कानून अपराध करार देना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। शराब पर पाबंदी लगाने को सफलता नहीं मिल सकती है ऐसा मुझे लगता है। शराब पर पाबंदी लगाने के लिए डेढ-दो करोड़ रुपये खर्च होंगे जो बेकार जाएंगे। यह मुंबई को लोगों का दुर्भाग्य है कि उन्हें ऐसे नेता मिले जो लोगों के भले के लिए भी गांधीबाबा को दुख देने का साहस नहीं रखते। वरना मुंबई के मंत्रियों को मद्रास के राजगोपालाचारी से पाठ पढ़कर गांधीबाबा को लॉक पर बैठाना मुश्किल नहीं था इसमें कोई शक नहीं।