161 26.10.1939 आजादी का मतलब यह कतई नहीं हो सकता कि उच्चवर्णियों को आजादी और हम पर अधिराज्य - मुंबई - Page 264

243

161

* आजादी का मतलब कतई यह नहीं हो सकता कि उच्चवर्णियों

को आजादी और हम पर अधिराज्य

26 अक्तूबर, 1939 को महायुद्ध से संबंधित प्रस्ताव पर हुई चर्चा में सहभागी होकर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने विधिमंडल में जो भाषण दिया वह इस प्रकार था-

स्वतंत्र लेबर पार्टी के नेता डॉ. भीमराव अम्बेडकर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच भाषण के लिए उठ खड़े हुए। पहले उन्होंने अध्यक्ष से अधिक समय देने की विनति की। कहा कि किस प्रकार ययाति को उसके पुत्र पुरुखा ने अपना जीवन दिया था उसी प्रकार उनके पक्ष के सदस्यों ने उन्हें बोलने के लिए अधिक समय मिले इसलिए उन्हें अकेले को भाषण की इजाजत दी है। महाभारत के दृष्टांत के साथ डॉ. बाबासाहेब ने भाषण की शुरूआत की। तालियां बजाकर सभी ने उनका अभिनंदन किया।

उन्होंने कहा-

मुझे लगता है कि यह प्रस्ताव अप्रस्तुत है। इस प्रस्ताव में जिन राष्ट्रीय मांगों का जिक्र किया गया है वे मांगें सम्माननीय मुख्य प्रधान (मंत्री) ने इस एसेंब्ली में रखी नहीं थी। मांगे उनके हाईकमांड ने प्रस्तुत की। कानूनन हाइकमांड का कोई अस्तित्व नहीं है। काँग्रेस मंत्री मंडल के कामों पर नजर रखने वाली वह एक समिति है। विजिलंस कमेटी है। उनकी मांगें सरकार द्वारा मानी नहीं गईं इसलिए सम्माननीय खेर आखिरी कोशिश के तौर पर इस प्रकार मदद की गुहार लगाते हुए यह प्रस्ताव रख रहे हैं। इस एसेंब्ली का यह बड़ा अपमान है।

18 तारीख को सम्माननीय वाइसरॉय का बयान प्रकाशित हुआ। उसके बाद सात दिन बीत गए। उस वक्तव्य पर राय प्रकट करने के लिए यह प्रस्ताव नहीं रखा गया है। यह क्षुद्र और छिछोरा है। मैं इस बारे में काफी कुछ बोल सकता हूं। हरेक को अपने प्रतिस्पर्धी की आलोचना करने का मौका मिलता है। लेकिन सम्माननीय खेर ने विनति की है कि हम मतभेदों को भूल जाएं। इसलिए पहले मैं यह बताता हूं कि इस प्रस्ताव के किस हिस्से के साथ मैं सहमत हूं। इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी लोगों को अपनी इच्छा के खिलाफ इस युद्ध में शामिल होना पड़ा। हमारी विदेश नीति अंग्रेजों के साम्राज्य के साथ जुड़ी है। उपनिवेशों जितना भी हमारा दर्जा नहीं है।

* जनताः 28 अक्तूबर, 1939