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गायकवाड़, एमएलए, नासिक- इस पते पर करें।’’ इस सूचना के अनुसार आयोजित मुंबई इलाका महार, मांग, वेठिया वतनदार (माफीदार) परिषद के अध्यक्ष के नाते डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का बेहद बोधप्रद, फड़कता और आस्थापूर्ण भाषण दिनांक 16 दिसम्बर, 1939 को हरेगांव में हुआ।
डॉ. बाबासाहेब ने अपने भाषण में कहा-
आज की परिषद महार, मांग और वेटिया के वतन के बारे में सोचने के लिए बुलाई गई है। परिषद क्यों बुलाई गई इस बारे में इस परिषद के स्वागताध्यक्ष और मेरे मित्र श्री भाऊराव गायकवाड़ ने बताया ही है। उनके भाषण के अनुसार ही मेरा भाषण भी होने के कारण पहले उन्होंने विस्तार से जो जानकारी दी थी उसे मैं संक्षेप में दोहराता हूं। उन्होंने महार मांग, वेठिया माफीदारों की चार प्रमुख शिकायतें आपके सामने रखी हैं। पहली शिकायत है कि सरकार ने अन्यायकारी रूप से बढ़ाई हुई ‘पूलापट्टी’। उन्होंने मुआवजा दिए बगैर सरकार ने उनकी जमीनें भी जब्त कर ली हैं। जब्त की गई जमीनों की कीमतों की रकम पर दिया जाने वाला ब्याज भी अब सरकार ने देना बंद कर दिया है।
इस वतनदारी के कारण उनके ऊपर लादे गए काम का मुआवजा नाकाफी तो है ही, आजकल उन्हें दी जाने वाली नकद रकम भी सरकार ने देना बंद कर उन पर एक और जुल्म ढाया है। इस प्रकार दरिद्रता में पिसते रहे इन लोगों का सभी ओर से शोषण किया जा रहा है और उनकी दरिद्रता को बढ़ाया गया है।
इन माफीदारों द्वारा किए जाने वाले 19 कामों को दर्ज करनेवाला एक घोषणा-पत्र काँग्रेस मंत्रीमंडल की ओर से जारी किया गया है। इस घोषणा-पत्र में जो काम दर्ज किए गए हैं उनमें से कुछ काम बेहद कठिन हैं और ये कामगार उसे कर नहीं पाएंगे।
यह हुई काफीदार कामगारों की कथा। इनके अलावा गांवों में ऐसे कामगार भी हैं जिन्हें सरकारी काम करने पड़ते हैं। लेकिन उन्हें जमीनें नहीं दी गई हैं। सरकार से उन्हें तनख्वाह भी नहीं मिलती। भीख मांग कर उन्हें अपना गुजारा चलाना पड़ता है। जान हल्क में आने तक सरकारी काम करने पड़ते हैं। इन ईमानदार नौकरों को सरकार तनख्वाह के बगैर छटपटाते हुए जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर कर रही है। कितना क्रूर अत्याचार है। यह अब पूलापट्टी बढ़ाने की माफीदारों की पहली शिकायत को देखें। इसका पता करने के लिए पहले हमें इस बात का पता होना जरूरी है कि ‘पूला’ क्या चीज है? सरकारी नौकरों को वतन जमीनें देने की पुरानी परंपरा रही है। यह प्रथा पेशवा और मुसलमानों के दौर में जारी थीं। उस वक्त के हालात आज से अलग थे। आज इंसान की योग्यता के अनुसार उसे नौकरी देने का चलन आम है। लेकिन पुराने जमाने में जमींदार पद्धति के अनुसार नौकरी विरासत में मिलती थी और वंश परंपरा से चलती थी। तब नौकरी का मुआवजा ईनाम में