162 16.12.1939 न्यायपूर्ण अधिकार पाने के आड़े सरकार आए तो विद्रोह करो, लेकिन अन्याय न सहो - हरेगांव (अहमदनगर) - Page 269

248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जमीनें देकर चुकता किया जाता था। आज नौकरों को वेतन दिया जाता है। पहले हर गांव में लेहनादार और बारा बलुतेदार हुआ करते थे। महार उनमें से एक थे। इन लेहनादारों को लगान माफ हुआ करता था। पेशवाई के आखिर में पैसों के अभाव में इन लोगों से थोड़ा लगान वसूला जाने लगा था जिसे ‘पूला’ कहते थे क्योंकि लगान इनसे नकद में नहीं लिया जाता था, अनाज के के रूप में लिया जाता था। अंग्रेजों का राज शुरू हुआ तब पुरानों में से कुछ वतन नष्ट कर दिए गए और कुछ जारी रखे गए। उसी दौरान आश्वासन दिया गया था कि पूला में बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। 1827 से 1875 का पूला न बढ़ाकर इस आश्वासन पर अमल किया गया। 1875 में पूला संबंधित कानून में एक धारा जोड़ी गई कि कामगार महारों की तनख्वाह बढ़ाने के लिए ही पूलापट्टी बढ़ाई जाएगी। इस धारा के बावजूद अब पूलापट्टी क्यों बढ़ाई जा रही है यह समझ में नहीं आ रहा है। महारों की तनख्वाह बढ़ाने के लिए यह बढ़ोतरी नहीं की जा रही है इसलिए यह बढ़ोतरी सभी तरह से गैर-कानूनी है। कहा जा सकता है कि पूलापट्टी बढ़ाकर सरकार ही कानून तोड़ रही है। सरकार का कहना है कि रामोशियों की तनख्वाह बए़ाने के लिए महारों की पूलापट्टी बढ़ाई जा रही है। लेकिन वतन ऐसी अजीब चीज है कि जो एक घराने से दूसरे घराने में नहीं जा सकती। एक महार का वतन दूसरे महार के घराने में तक नहीं जा सकता। इसके बावजूद रामोशियों के लिए महारों की पूलापट्टी सरकार बढ़ा रही है तो आखिर क्यों? कितना बड़ा अन्याय है यह! महार गरीब हैं और सरकार ने अपने बर्ताव से यही साबित किया है कि गरीब का रक्षक कोई नहीं होता। हिंदुओं की तरह सरकार की भी शायद यही राय है कि महार आंदोलन करते हैं, उनकी आंखों में चर्बी चढ़ गई है। वरना महारों से छीन कर रामोशियों की तनख्वाह क्यों बढ़ाई जाती? मेरी राय यही है कि रामोशियों को भी भरपूर तनख्वाह दी जानी चाहिए, लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूं कि महारों से खसोट कर इस प्रकार तनख्वाह बढ़ाने में क्या तुक है? यह अन्यायपूर्ण है।

आज इस हिन्दुस्तान में कई ऐसे वतनदार लोग हैं जो सरकार का रत्तीभर काम नहीं करते। उनके रुपयों से रामोशियों की तनख्वाह बढ़ाने में हर्ज ही क्या है यह समझ नहीं आता।

पेशवाकाल में देसाई, देशपांडे, देशमुख, कुलकर्णी, पोतदार, पाटील आदि कई जागीरदार हुआ करते थे। सिफारिशों से उनकी संख्या काफी बढ़ गई थी।

अंग्रेजों के राज में अब उनके लिए कहीं कोई काम नहीं बचा है। उनकी नौकरियां गईं लेकिन नौकरी के रहते उन्हें दी गई जमीनें उन्हीं को दे दी गई हैं। उनकी आमदनी से प्रति रुपया पांच आने काट कर बारह आने उन्हें दिए जाते रहे। इस प्रकार पुराने जमाने के नौकरों को वंश परंपरा से बनी सरकार ने रैयत के पैसों से पेन्शन दी ऐसा भी कहा जा सकता है।