162 16.12.1939 न्यायपूर्ण अधिकार पाने के आड़े सरकार आए तो विद्रोह करो, लेकिन अन्याय न सहो - हरेगांव (अहमदनगर) - Page 270

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अब रामोशियों की तनख्वाह देते हुए महारों की पूलापट्टी बढ़ाने के बजाय बेकार बैठ कर खाने वाले पेंशनरों की पूलापट्टी क्यों नहीं बढ़ाई गई? मेरी राय में इसकी केवल एक ही वजह है ‘देवो दुर्बलघातकः’। विरासत से पेंशन का लाभ लेने वाले लोगों पर पूलापट्टी चढ़ाकर दरिद्रता में परेशान महारों और रामोशियों को सरकार सुखी कर सकती थी। लेकिन पूंजीवादी सरकार को यह भला कैसे रास आता?

पुराने जमाने में जागीरदारों का एक वर्ग हुआ करता था। ये लोग सैनिकों को पालते और जरूरत पड़ने पर सरकार की मदद करते। तब उन्हें भी उस जमाने में सरकार से जमीनें मिली हुई हैं। आज इन लोगों पर फौज पालने की जिम्मेदारी नहीं है। लेकिन जमीनें आज भी उन्हीं के कब्जे में हैं और इन जमीनों से उन्हें आज 2,67,501 रु. की आय होती है। इस रकम से भी रामोशियों को तनख्वाह बढ़ा कर दी जा सकती थी। लेकिन ऐसा अगर करती तो सरकार बेशर्मी से महारों की ऐसी बुरी गत कैसे करती? इन उदाहरणों से क्या यह बात साबित नहीं होती कि हमारी माई-बाप सरकार मुफतखोरों की ही तरफदारी करती है?

अब हम गांव के लिए काम करनेवालों के पारिश्रमिक के मसले पर सोचें। गांवों में पाटील, कुलकर्णी और महार सरकारी कामगार हैं। उनके साथ सरकार का रवैया किस प्रकार पक्षपातपूर्ण होता है यह आगे बताए जा रहे उदाहरण से स्पष्ट होता है-

गांव के पाटील को सरकार पासोडी (कपड़ा), जमीन, लगान के अनुपात में पेशगी और ऊपरी खर्चे के लिए रकम दी जाती थी। केवल कुछेक गांव कामगार महारों को ही लेकिन जमीनें दी गई हैं। कोकण के महारों के पास जमीनें नहीं थीं और देश के महाराष्ट्र में सह्योद्री के पास का इलाका) कई गांवों के महारों के पास भी जमीनें नहीं हैं। जमीन न होने के कारण इन सरकारी नौकरों को पूरी तरह बलूते पर ही निर्भर रहना पड़ता है यह अलग से बताने की जरूरत नहीं। क्या सरकारी कामों के लिए गांव कामगारों को तनख्वाह देना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? इस जिम्मेदारी के झटक देने वाली सरकार अन्यायी है। और यह भी कहना पड़ेगा कि ऐसी सरकार की चाकरी करने वाले महार भी नादान ही हैं। सरकार महारों के समधी या जंवाई तो नहीं हैंउन्हें सरकार की मुफत में सेवा चाकरी करनी पड़े। मालिक तनख्वाह नहीं देता तो उसे लात मारना नौकरों को सीखना होगा। इस परिषद के द्वारा हम आज सरकार को छह महीने की नोटिस देते हैं। इसने समय में महार कामगारों को तनख्वाह देने का प्रबंध अगर सरकार करती है तो ठीक, वरना बिना वेतन काम करने वाले इलाके भर में कामगारों को हड़ताल पुकारनी चाहिए।

सरकार ने हाल ही में उन 19 कामों की फेहरिस्त सार्वजनिक की है जो इन कामगारों को करने होते हैं। जबसे यह सूची सार्वजनिक की है तब से श्री रणखांबे कहते फिर रहे हैं कि ये काम स्वतंत्र लेबर पार्टी ने महारों पर लादे हैं। कोई अगर कहने लगे कि स्वतंत्र लेबर पार्टी मूर्खता कर रही है, पक्ष गलती कर रहा है तो इस बारे में स्वतंत्र लेबर पार्टी अपना कहना योग्य है यह वाद-विवाद कर साबित कर सकती है। लेकिन स्वतंत्र