162 16.12.1939 न्यायपूर्ण अधिकार पाने के आड़े सरकार आए तो विद्रोह करो, लेकिन अन्याय न सहो - हरेगांव (अहमदनगर) - Page 271

250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लेबर पार्टी बेईमान है’। यह कोई घी पाने के लालच में कहने लगे तो कहने के बगैर कोई चारा नहीं रहेगा कि वह हरामखोर है।

स्वतंत्र लेबर पार्टी अगर बेइमान होती तो राजनीति में बहुसंख्यक काँग्रेस का वह खुले आम सीना ठोकर विरोध नहीं करता। गांधी की पार्टी से जाकर मिलना, उस पक्ष की खुशामद करना आदि के लिए आपका विशेष ईमानदार होना जरूरी नहीं। उस पक्ष से जा मिलना, उसे सहयोग देना आसान है। दो पैसों की गांधी टोपी पहनने वाले को उस पार्टी में मंत्री पद भी प्राप्त होता है। उस पार्टी से मिलना, उनकी जय करना कोई सूली पर लटकाई मिठाई निकाल कर खाने जितना मुश्किल काम नहीं है। इस बात को हमारे आलोचक ध्यान में रखें।

अब सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए गांव कामगारों के कामों के बारे में सोचते हैं। इस बारे में गांव कामगारों को एक बात ध्यान में रखनी होगी, अगर उनहें वतन चाहिए तो वतन के लिए काम करना ही पड़ेगा। वतन चाहिए लेकिन काम नहीं चाहिए कहने से चलेगा नहीं। लेकिन गांव कामगारों की सूची में महारों पर लदे निम्नांकित काम अगर उन्हें करने हों तो उन्हें हर रोज मजदूरी देनी जरूरी है। सरकार का लगान ले जाकर तिजोरी में भरना, सरकारी कागजातों का लाना-ले जाना, सरकारी डाक ले जाना, लाना, मवेशीखानों से चौपायों को नीलामी के लिए के जना अधिकारियों के लिए तंबू लगाना आदि काम बिना दिहाड़ी दिए महारों से करवाना बेगार करवाना ही है, एक तरह का जुल्म ही है। गांव ही में जो काम करने हैं वे हमेशा की तरह चलते रहें लेकिन बाहर गांव जाकर किए जाने वाले काम बिना दिहाड़ी के कोई भी ना करें। इस तरह के बाहर जाकर किए जाने वाले कामों के लिए कामगार को कम से कम आठ आने की दिहाड़ी तो मिलनी ही चाहिए।

15 नवम्बर का काम है लापता व्यक्ति की लाश को ठिकाने लगाना। कोई भी स्वाभिमानी महार यह काम करने के लिए तैयार नहीं होगा।

काम नं. 2 है सरकारी जानकारी देने के लिए लोगों को बुलाना। यह काम घर-घर जाकर बुलाने के बजाय ढिंढोरा पीट कर बुलवाना चाहिए। जन्म-मृत्यु दर्ज को करने का काम महारों पर लादना अन्यायकारी होगा। जिसके घर जनम या मृत्यु होगी उनहीं पर उस घटना को दर्ज करने की जिम्मेदारी होनी चाहि। इस प्रकार जागीरदार महार, मांग और वेठियों की बहुत सारी शिकायतें हैं। उनका निवारण करने के लिए हमें गवर्नर साहब के पास डेप्युटेशन ले जाना होगा। उन्हें अपनी अड़चनें समझा कर बतानी होंगी। इस बारे में एक विस्तृत अर्जी हमें सरकार को देनी होगी। इससे हमारा काम बन जाए, शिकायतों का अगर निवारण हो तो ठीक है वरना हमें सत्याग्रह करना होगा। इस अन्याय का हमें विरोध करना होगा।

आज हमारा हाल पुराने कपड़े की तरह हुआ है। थेगलियां जोड़ कर काम नहीं बनेगा। आकाश में कहां तक थेगलियां लगाओगे? बतनों को छोड़े बगैर कोई दूसरा इलाज नहीं है।