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1926 से मैं यह बात बता रहा हूं। उस वक्त वतन, महारकी, डल्या, सागुती के मोह से आप उबर नहीं पा रहे थे। आज आपकी नजरों से मोह का पर्दा हटा हुआ देखकर मुझे कृतार्थ महसूस हो रहा है!
जागीरें छोड़ें लेकिन जमीनें हाथ से जाने दें। लगान अदा करें और वतन पाने की गुलामी से मुक्त होकर स्वाभिमानी किसान बनें। औरों के वतन बिना काम किए भी छीने नहीं गए हैं। आज कुलकर्णियों की पांचों उंगलियां घी में हैं। सरकार ने उन्हें मानों पेन्शनर ही बना दिया है। ऐसे में सरकार अगर आपकी न्यायपूर्ण हकों में अड़ंगे डालने लगे तो जरूर विद्रोह करें, अन्याय कदापि सहें नहीं।
न्याय पाने के लिए हम एक कमेटी नियुक्त कर शुरूआत करेंगे। हम सरकार को अर्जी भेजेंगे। डेप्युटेशन ले जाएंगे। सब कुछ कानूनी ढंग से करेंगे। इसी से हमारा काम चलेगा ऐसी आशा है। इसके बावजूद अगर काम नहीं होता तो क्या करना है यह भी हम तय करेंगे। आखिर मेरे वतन बिल का क्या बता कर मैं अपना भाषण पूरा करता हूं।
काँग्रेस सरकार सत्ता में आने से पहले तात्कालिक कूपर मंत्रीमंडल अस्तित्व में था। उसमें मंत्री बनने से इनकार करने के कारण कुछ समय तक काँग्रेस की सभाओं में मेरा सम्मान काफी बढ़ गया था।
* ‘‘स्वतंत्र लेबर पार्टी लेबर पार्टी की राय थी कि भारत का नया संविधान यानी भारत सरकार अधिनियम
दोषपूर्ण था और पूर्ण जिम्मेदार प्रशासन के लिए वह पूरा नहीं पड़ता था। काँग्रेस पार्टी भी इस संविधान
से संतुष्ट नहीं थी। वह उसे तोड़ना चाहती थी। पहले उन्होंने काम करने से इनकार किया। लेकिन आगे
जुलाई, 1937 में उन्होंने सरकार बनाई। तब धनजी शाह कूपर अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री बने। कुछ
समय तक वे लोग प्रशासन चलाते रहे। सर धनजी शहा ने डॉ. अम्बेडकर को आमंत्रण दिया था लेकिन
डॉ. अम्बेडकर ने उसे अस्वीकार किया था। क्योंकि उनकी राय में सर धनजी शहा के शासन के लिए
बहुसंख्यकों का समर्थन नहीं था और इसलिए वह विधिग्राह्य सरकार नहीं थी। इसीलिए हमारे पक्ष ने
उस वक्त सरकार में प्रवेश नहीं किया।’’ - न्या. आर. आर. भोले का लिखा, ‘स्वतंत्र लेबर पार्टी और
मुंबई विधानसभा’’ शीर्षक वाला लेख- डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर गौरव ग्रंथ- महाराष्ट्र राज्य साहित्य
आणि संस्कृति मंडल, मुंबई-136 37।
काँग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद मेरे वतन बिल को मंजूरी देने की बात उन्होंने स्वीकारी थी।
लेकिन समयावकाश काँग्रेस के दिन फिरे। इसकी मुझे फिक्र नहीं। मेरे हाथ में अभी भी कुछ बाण
बचे हुए थे। पुणे करार से पहले गांधी ने अनशन रखा था। मुझे उम्मीद थी कि उसके बाद उनका और
काँग्रेस का दिल बदलेगा। मुझे उम्मीद थी कि हम एक-दूसरे के सहयोग से काम करेंगे। लेकिन आखिर
यही अनुभव प्राप्त हुआ कि चोरों के साथ सहयोग संभव नहीं। आज काँग्रेस पूर्ण स्वाधीनता चाहती है।
स्वाधीनता देने से पूर्व हमारी मांगें पूरी होनी चाहिए यह हमारी शर्त है। औरों को एक रोटी देते समय
चौकोर रोटी हमारे हिस्से में आनी चाहिए। हमें भूखा रख कर अगर कोई भोज उड़ाने लगे तो उनके
खाने में मिट्टी मिलाए बगैर हम चुप नहीं रहेंगे। ऐसे हालात में आप सब एकजुट होकर और प्रतिकार
की जरूरत आने पर जोरदार लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए।