163 24.12.1939 युवकों, निर्भंय बनोऋ स्वाभिमान डिगने न दो - अंकलखोप (सातारा) - Page 273

252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* युवकों, निर्भय बनोः स्वाभिमान डिगने न दो

अंकलखोप में 24 दिसम्बर, 1939 के दिन दोपहर में सातारा जिला अस्पृश्य युवक परिषद हुई थी। परिषद की अध्यक्षता करना डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने स्वीकारा था। सभा के लिए बड़ा जनसमुदाय उपस्थित था। अंकलखोप जाते हुए रास्ते में भिलवडी गांव की महिलाओं ने डॉक्टर साहब की आरती उतार कर उनके प्रति अपने मन में बसे अपार भक्तिभाव को व्यक्त किया। स्वागत मंडल के अध्यक्ष मि. पी.टी. मधाले और अन्य सदस्यों ने बड़ा जुलूस निकाल कर डॉक्टर साहब के साथ मंडप में प्रवेश किया। सभा में उपस्थित जन-समुदाय ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ डॉक्टर साहब का स्वागत किया।

परिषद के स्वागतध्यक्ष श्री मधाले ने स्वागत में भाषण किया। उसमें वह बोले, ‘‘हम अस्पृश्यों पर डॉ. बाबासाहेब के भगवान से भी अधिक उपकार हैं। सज्जनों की रक्षा कर दुर्जनों का परिहार करने के लिए परमेश्वर ने दस अवतार धारण करने की कथा हिंदू धर्म में बताई जाती है। लेकिन इन दस में से किसी एक अवतार को भी हम अस्पृश्यों का तथा हम पर हो रहे जुलमों का ख्याल नहीं आया। आजकल हमें हरिजन कह कर प्यार जताने वाले महात्मा ने भी हमारे स्वाभिमान के लिए पोषक कार्य कभी नहीं किया है।

स्वागताध्यक्ष के भाषण के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का अध्यक्षीय भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में कहा-

‘बहनों, युवा मित्रों और भाइयों,

आज की सभा मुख्यतः युवाओं की है। आज की सभा के अध्यक्ष, मेरे मित्र मधाले युवा ही हैं। आपको लगता होगा कि आज की सभा में केवल युवाओं के लिए ही भाषण होगा। लेकिन आज की सभा में युवाओं के साथ-साथ युवाओं में गिने न जा सकने वाले लोग भी हैं। उन्हें भी लगता होगा कि मैं हमारे समाज को जिन विषयों में दिलचस्पी हो उन पर मेरे बोलने की उम्मीद तो होगी ही। इसलिए, पहले इन लोगों से दो शब्द कह कर बाद में मैं युवाओं के सवालों की ओर मुड़ंगा। (यहां डॉक्टर साहब ने हरेगांव के महार वतनदार कामगारों की सभा में जिन मसलों के बारे में बताया था उन्हें फिर विस्तार से समझाया)।

* जनताः 6 जनवरी, 1940