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फिर युवाओं को उद्देश्य कर वह बोले- ‘जनता’ में मेरे विचार हर हफते प्रकाशित होते रहते हैं। यह अखबार पढ़ने से आपको अपने से जुड़े सवालों की जानकारी मिलती रहेगी।
हमें स्वाभिमान की बहुत जरूरत है। स्वाभिमान को छोड़कर जो उन्नति हासिल की जाती है वह किसी काम की नहीं होती। हर युवक को अपने मन में एक बात गांठ मार कर रखनी चाहिए कि हम भी औरों की तरह की इंसान हैं।
भगवान को कभी यह मंजूर नहीं होगा कि महारों को महारबाड़े में ही रहना चाहिए। हजारों सालों से हम पर जो जुल्म जबरदस्ती होती आई है उसके कारण हमारे समाज की भावनाएं मर-सी गई हैं। ब्राह्मणों के राज्य में हम अगर स्वाभिमान से बरतते तो हम पर ‘औकाल भूलने’ का आरोप मढ़कर हमें हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया होता।
हमें उन्नति का मार्ग खुद बनाना होगा। जो भी आरीव और अमंगल हैं वे सभी रिवाज हमें छोड़ देने होंगे। ‘जो झोली में पड़े वह खाने और रोटी के टुकड़े चबाने’ के दिन अब लद गए हैं। हमारे लोगों को भी समाज के अन्य लोगों की तरह हमारे लोगों को भी अधिकार के पद मिलने चाहिएं। हमारे लोगों की अब पुलिस में बहुत कम संख्या में ही सही लेकिन भर्ती होने लगी है। आज भी हमारे सुशिक्षित युवाओं को पुलिस विभाग में अधिकार के पद नहीं मिलते यह दुख की ही बात है। सरकार को आज भी यह डर लगता है कि अस्पृश्य को अधिकारी नियुक्त किया तो उसके मातहत काम करने वाले स्पृश्य लोग नाराज हो जाएंगे। क्या यह इस देश का दुर्भाग्य नहीं है?
जरूरत है हमें अपने अंदर निर्भयता को पनपने-पलने देने की। अपने समाज को दुनिया में सम्मान दिलाने के लिए हमें अपनी जान की कुर्बानी देने तक के लिए तैयार रहना होगा। हम सब इस प्रकार तैयार होंगे तो कोई हमारा अपमान करने की हिमाकत नहीं कर सकता। आप सभी युवाओं से मेरा यही कहना है कि ‘निर्भय बनें और दुनिया पर राज करो।’
अब हमारी राजनीति के बारे में मैं आपको दो-चार शब्दों में बताता हूं। हिन्दुस्तान में अपनी राजनीति का मामला फिर से शुरू होगा, ऐसा लगता है। काँग्रेस पार्टी और अस्पृश्य इन दोनों के बीच मतभेदों का आमने-सामने बैठकर हल नहीं निकल सकता।
हमें मिले हुए राजनीतिक अधिकार नाकाफी हैं। काँग्रेस के राज में भी हमारे हितों की रक्षा नहीं होती। काँग्रेस को जब अधिक अधिकार मिलते हैं तो उनके द्वारा हम पर होने वाले जुल्म भी बढ़ते हैं।
अल्पसंख्यकों का एक दोष है कि वे केवल अपने बारे में सोचते हैं। ब्राह्मणेतर