256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और अफगानिस्तान या अरेबिया या टर्की के बीच अगर लड़ाई छिड़ जाए तब हिंदी मुसलमान किसकी तरफदारी करेंगे? हिंदुस्तान की या विदेशियों की? हिंदुस्तान की आजादी की जिम्मेदारी हम सब पर है यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए। वे अगर अपनी इस जिम्मेदारी को टालेंगे तो बताना नहीं पड़ेगा कि हिंदी जनता का उन पर का विश्वास उठ जाएगा।
दूसरी बात यह कि मुसलमान अगर सभी हिंदुओं पर आरोप मढ़ेंगे तो वह सही नहीं होगा। उनका ऐसा गलत होगा। मैं यहां आया तब मुझे बताया गया कि लिंगायत और मराठा लोग यहां ब्राह्मणों के खिलाफ हैं। इन लोगों के बीच बातचीत भी नहीं है। लिंगायत, मुसलमान, मराठा और अस्पृश्य सभी पिछड़े हुए हैं। इन सभी समान रूप से दुखी लोगों को आपस में सहयोग का बर्ताव रखने में क्या हर्ज है?
सच बात तो यह है कि केवल ऐसा करने से ही उनका हितसाधन हो सकता है यह मानने के अलावा कोई और चारा नहीं है। सन् 1937 से पहले मुंबई सरकार के दिवाण क्या लिंगायत, मराठा और मुसलमान जाति के ही नहीं थे। वे आपस में लड़ते नहीं थे, मिल-जुल कर काम किया करते थे। सो, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप सब मिल-जुलकर सहयोगिता से काम क्यों नहीं कर सकते? अपनी जाति के हित के लिए भले हर जाति विभिन्न संस्थाएं चलाएं लेकिन जब तक वे राजनीति के क्षेत्र में एक साथ मिलकर काम नहीं करते तब तक उनका कल्याण संभव नहीं यह बात पक्की हैं। मेंढकी चाहे जितना फूले, बैल नहीं हो सकती। यह बात जाति की संस्थाओं के बारे में भी सच है। प्रांत एसेंब्ली में मुसलमानों के तीस प्रतिनिधि हैं। मुसलमान समाज ने अगर बाकी समाज के साथ मिल-जुलकर नहीं रहना तय किया तो उनके कुल 30 प्रतिनिधियों की संख्या वे इकत्तीस भी नहीं कर पाएंगे। तीस मुसलमान प्रतिनिधि चाहे जितना अपने को मुसलमान कहलवाकर हल्ला मचाएं, अन्य पिछड़ी जातियों से दूरी बना कर रहें तब भी इन जातियों का इससे कोई नुकसान होने वाला नहीं है। इसीलिए मुसलमान समाज को अन्य छोटे गुटों को सहयोग देना ही चाहिए यह उनके प्रति मेरा आग्रह है। इस तरह, के बर्ताव में ही उनका हित है।