165 26.12.1939 अन्याय करनेवालों को स्वराज मांगने का कोई अधिकार नहीं - बेलगांव - Page 278

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* अन्याय करने वालों को स्वराज मांगने का कोई अधिकार नहीं

26 दिसम्बर, 1939 को सुबह 10 बजे बेलगांव म्युनिसिपालिटी द्वारा डॉ. अम्बेडकर को मानपत्र दिया गया। उस सम्मान-पत्र के लिए जवाब देते हुए उन्होंने कहा-

आज शाम यहां आयोजित स्वतंत्र लेबर पार्टी की परिषद के अध्यक्ष के रूप में आज शाम मुझे भाशण देना ही पड़ेगा। आप में से जिन्हें मेरी राजनीतिक भूमिका जानने की जिज्ञासा है वे सब मुझे उम्मीद है कि हम परिषद में उपस्थित रहेंगे। सो, यहां मुझे विस्तृत भाषण देने की जरूरत नहीं है। आपने आज मुझे जो मानपत्र दिया है, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। मुझे पता चला है कि आज तक आपने राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं को जो मानपत्र दिए उनके लिए सभी की सहमति नहीं थी। हालांकि मुझे सबकी सहमति से मानपत्र दिया जा रहा है, इसका भी मुझे पता चला है। इससे ऐसा हर्गिज नहीं माना जाना चाहिए कि बेलगांव म्युनिसिपालिटी के सभी पक्षों के सभी सदस्यों का मुझसे स्नेह है। हो सकता है इसके पीछे यही उद्देश्य हो कि मेरे ज्योतिबा को तेल लगाने के पीछे आपकी मंशा यह हो कि हमारे लोग आपके खंडोबा का भंडारा लगा लें। मेरा तर्क इसी दिशा का संकेत दे रहा है। असल में, मैं जो काम कर रहा हूं वह आप ही काम है। पीढि़यों से आपने जो पाप किए हैं, मुझे उन्हें निपटाने पड़ रहे हैं। इन पापों की जिम्मेदारी मुझ पर नहीं है। वह अस्पृश्यों पर भी नहीं है। वह पूरी तरह आप स्पृश्यों पर ही है। यह बात आपको भूलनी नहीं चाहिए।

मैं साफ-साफ आपको बता दूं कि इस पाप को कायम रखते हुए आप स्वराज का जो आंदोलन कर रहे हैं और पूर्ण स्वराज की आपकी जो मांग है वह मेरे मन में शक पैदा करती है। अस्पृश्यों को पीने के लिए पानी नसीब नहीं होता, जनसंख्या के अनुपात में उन्हें नौकरियां नहीं मिलतीं जैसे सभी अन्यायों की जिम्मेदारी आप पर ही है। दूसरों को मुश्किल में डाल कर स्वराज मांगने का आपको क्या कह है यह मेरी समझ में नहीं आता।

अपना राजनीतिक काम थोड़ी देर के लिए रोक कर आप अगर अस्पृश्यता को नष्ट करेंगे तभी साबित होगा कि आप ईमानदार हैं। अपने विचारों को आपके सामने मैंने दिल

खोल कर रखें हैं। मैं बड़ा देशद्रोही हूं, अंग्रेजों को मैं बगल बच्चा हूं, स्वराज के राह को मैं पत्थर हूं, मैं असुर हूं, इस प्रकार की बातें अपने को सत्य और अहिंसा की भक्त कहलाने वाली काँग्रेस जब फैला रही हो तब आपने यह मानपत्र देकर मेरा जो सम्मान किया और अपनी बिरादरी को जवाब दिया इसके लिए आपके प्रति धन्यवाद प्रकट कर अपना भाषण समाप्त करता हूं।

* जनताः 30 दिसम्बर, 1939