97 16.1.1937 ये पद सम्मान के नहीं, कुछ कर दिखाने के हैं - इगतपुरी - Page 28

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और अज्ञानी आदमी अगर विधि मंडल में जाए तो भी कोई हर्ज नहीं है लेकिन आपका प्रतिनिधि उस तरह का होना नहीं चाहिए। आपका प्रतिनिधि उससे कम से कम 15 प्रतिषत अक्लमंद और कर्त्तव्यतत्पर होना चाहिए।

सुना है कि अपने नासिक जिले में गायकवाड और रणखांबे इन दो कार्यकर्त्ताओं के होते हुए मैंने भाऊराव गायकवाड को ही क्यों चुना इस बात को लेकर काफी संदेह फैला है। हमारे नासिक जिले के दो लोग गायकवाड और रणखांबे विधि मंडल में जाने के लिए योग्य हैं यह बात सही है। इसीलिए चार महीनों से पूर्व दोनों को बुलाकर मैंने साफ-साफ बताया था कि आपके जिले की तरफ से विधि मंडल चुनावों में कौन उतरे इस बारे में आप दोनों आपस में तय कर मुझे बताएं। और मैंने यह भी साफतौर पर बताया था कि अगर इस बात का निर्णय आप दोनों के बीच आपसी बातचीत से नहीं होता और अगर मुझे इस बारे में फैसला देना पड़े तो मेरा फैसला गायकवाड के पक्ष में होगा। यह बात मैंने रणखांबे से भी कहीं थी। क्योंकि, मैंने कहा था कि आप दोनों में से अधिक योग्य कौन है यह हम आपसे अच्छी तरह जानते हैं कि रणखांबे को आगे करने वाले कौन हैं इसकी कहानी मैं पूरी तरह जानता हूं। इसीलिए अमृतराव रणखांबे से अधिक मुझे भाऊराव गायकवाड योग्य लगे।

दूसरी बात यह है कि श्री रणखांबे ने राजीखुशी, अपने होशोहवास में अपने हस्ताक्षर के साथखत भेजकर मुझे साफ तौर पर बताया है कि विधि मंडल में नासिक जिले की आरक्षित जगह के लिए श्री भाऊसाहब गायकवाड को ही चुनें। ऐसे में श्री रणखांबे को आज श्री गायकवाड की उम्मीदवारी में उनकी मदद करनी चाहिए। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से मदद करने या कम से कम नातरफदार रहने के बजाय रणखांबेखुले आम भाऊराव गायकवाड की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे हैं, इसे क्या कहें - वैसे देखा जाए तो रणखांबे और रोकडे घरानों के बीच मेरी जानकारी के अनुसार किसी वजह से विवाद चल रहा था। दोनों के बीच प्रेम भावना या मित्रता भाव बिल्कुल नहीं था। इसलिए रणखांबे का नाम मैंने विधि मंडल के लिए नहीं सुझाया इसलिए पिछले कई सालों से भाइयों की तरह रहे गायकवाड के खिलाफ जाकर रणखांबे विरोधी गुट के लोगों के गले मिले और आज तक जो मित्र था उसका विरोध करे यह न्यायपूर्ण नहीं है। रणखांबे का यह बर्ताव अयोग्य है। नासिक जिले के संगठन में मनमुटाव और बखेडाखड़ा करने के लिए श्री रणखांबे ही जिम्मेदार हैं। भाषण पूरा करने से पहले मैं सबसे आग्रहपूर्वक एक विनिती करना चाहता हूं कि 17 फरवरी, 1937 को मतदाता भाई-बहन अपनाखर्चाखुद उठाते हुए या पैदल चलकर पुलिस स्टेशन जाकर अपने चारों मत पृथक मजदूर पक्ष की ओर सेखड़े उम्मीदवार भाऊराव गायकवाड को ही दें। उनकी निशानी है घोड़ा। घोड़े के चित्र को दाहिनी ओर चार बार कांटे का निशान बनाएं।