166 26.12.1939 स्वराज आपका और राज हम पर! - बेलगांव - Page 280

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ब्राह्मण ही हैं। और हमारे इलाकों में 7 मंत्रियों में से 3 ब्राह्मण, 1 मराठा, 1 पारसी, 1 मुसलमान और 1 जैन है। अब हम नौकरियों के बारे में सोचें। मुंबई इलाके के रा­ जस्व विभाग को लीजिए। उसमें सभी ब्राह्मण ही हैं। मामलातदारों का उदाहरण लीजिए। इलाके में कुल 188 मामलातदार हैं लेकिन जाति के हिसाब से देखें तो ब्राह्मण हैं 83, बनिए 11, मुसलमान 23, मराठे 18, लिंगायत 10, ढोर 1, और अन्य जातियों के 43 हैं। महालकरी कुल 35 हैं जिनमें 20 ब्राह्मण हैं, 2 बनिए हैं, 5 मुसलमान हैं, 3 मराठा हैं और अन्य 5 हैं। हेडक्लर्क 217 हैं जिनमें से 111 ब्राह्मण, 12 बनिए, 10 प्रभु, 14 मुसलमान, 14 मराठा, 7 लिंगायत और अन्य 49 हैं। महालकरी और हेडक्लर्कों में एक भी अस्पृश्य नहीं है। पूरा कैबिनेट ब्राह्मणों के ही हाथों में है। एसेंब्सली के 175 में से 52 सदस्य ब्राह्मण हैं। पहले कितने ब्राह्मण थे? क्या काँग्रेस ने ब्राह्मण गैर-ब्राह्ममण विवाद खत्म किया?

अस्पृश्यों के बारे में तो ना ही पूछें। केवल ठगी चली है। गांधी ने आमरण अनशन किया। महात्मा अगर चला जाता तो दुनिया उजड़ ना जाती। लेकिन सुलह करने के लिए दबाव डाला गया। मैंने सुलह की। और संयुक्त चुनाव क्षेत्र में शामिल हुआ। लेकिन सुलह करते वक्त उन्होंने 15 के बदले 16 जगहें तक नहीं दी। उल्टे, चुनाव के समय मेरी कुछ सीटें कम कर दीं। लेकिन स्पृश्यों के लिए जो जगहें थीं उन पर अस्पृश्यों को चुनाव लड़ने नहीं दिया। इसी कारण मुसलमानों को काँग्रेस पर भरोसा नहीं है।

यह काँग्रेस का ही पाप है। उन्होंने मंत्रीमंडल में अल्पसंख्यकों को नहीं लिया है। हमारे खिलाफ उम्मीदवारों को खड़ा कर उन्होंने चार लोगों को जिताया। लेकिन उनमें से किसी को उन्होंने मंत्रीमंडल में जगह नहीं दी। क्यों, तो कहते हैं कि वे नालायक हैं। फिर अपने नालायकों को क्यों चुना? मैं मंत्री बनना नहीं चाहता। मुझे मंत्रीपद का लालच नहीं है। मैं अपने समाज के लिए मरना चाहता हूं। मैंने ही गवर्नर से विनति की कि अल्पसंख्यकों को मंत्रीमंडल में लें। क्योंकि जिसके हाथ में अधिकार होता है वही सत्ताधीश होता है। कलक्टर मामलातदार आदि लोग मंत्रीमंडल के कागजों को कहां मानते हैं? इसीलिए हमारी लड़ाई अधिकार पाने के लिए है। मुसलमानों के मंत्रीमंडल जिन प्रांतों में हैं वहां केवल मुसलमान सदस्यों की बहुलता के बावजूद उन्होंने सम्मिश्र मंत्रीमंडल बनाए। यह संतोष की बात है। बंगाल के मंत्रीमंडल में 2 अस्पृश्य दीवाण हैं, असम में एक अस्पृश्य दीवाण है और पंजाब में 2 पार्लियमेंटरी सचिव हैं। दीवाण पद की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं थे इसलिए उन्होंने दो सचिव नियुक्त किए। सिंध के बारे में पूछना ही क्या! वहां अस्पृश्य नहीं हैं। काँग्रेस वालों को इस बात में शर्म आनी चाहिए। जो नालायक हैं उनसे इस्तीफा लेकर उस जगह आप किसी लायक व्यक्ति को क्यों नहीं ठोक कर लाए? हम उसकी राह में अड़ंगा नहीं बनते। अगर नियम