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इस्तेमाल करते। गवर्नर्स को अपने इन खास अधिकारों का इस्तेमाल नहीं करना पड़ा उसका मतलब ही यह है कि काँग्रेस के कार्यकाल के दौरान मुसलमानों पर जुल्म हुए ही नहीं।’’ ऐसा अगर सिर्फ काँग्रेस के ही नेता कहते तब भी गनीमत थी। लेकिन हाल ही में हिन्दुस्तान में जिनका आगमन हुआ है और फिलहाल काँगे्रेसी की मेहमानवाजी का लाभ उठाते हुए जो एक अंग्रेज व्यक्ति पूरे हिन्दुस्तान की यात्रा पर हैं उन सर क्राफर्ड क्रिप्स ने भी इसी लय में अपने सुर मिला लिए हैं और इसीलिए इस घातक युक्तिवाद का खंडन करना जरूरी हो गया है।
अधिकार ग्रहण से पहले काँग्रेस सरकार का अंग्रेज सरकार के साथ जो वितंडावाद हुआ था वह आपको याद होगा ही। इसी मसले पर यानी गवर्नर्स को दिए गए विशेषाधिकारों पर काँग्रेस सरकार बिखरी थी। अधिकारग्रहण से पूर्व इस बात का आश्वासन मिले कि गवर्नर्स अपने विशेषाधिकारों का सहारा नहीं लेंगे, यह जिद उन्होंने पकड़ ली थी। सबको यह बात याद है। अचरज की बात यह है कि इस प्रकार का आश्वासन मिलने के बाद ही अपने सत्ता ग्रहण की बात सत्ता में आने के बाद काँग्रेस निरंतर कहती रही है। यही काँग्रेस आज ऊंचे स्वर में बता रही है कि गवर्नर्स ने अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया यही हमारे न्यायपूर्ण सुशासन का प्रमाण है, यही हमारे निरपराधित्व का सबूत है। पता नहीं यह दलील वे किस नीतिवाद से ढूंढ कर ले आए हैं।
जिस प्रांत में काँग्रेस सत्ता में आई वहां काँग्रेस का इतना अधिक मताधिक्य था कि गैर-कांग्रेसी पार्टियों का उस प्रांत में सरकार बनाना असंभव था। मुंबई प्रांत में काँग्रेस का इतना मताधिक्य नहीं था हालांकि गैर-काँग्रेसी पार्टियों के बीच इतनी मिथता थी कि उनकी संयुक्त सरकार बनना संभव नहीं था। किसी और पक्ष की सरकार बनना जब संभव नहीं हो तब कोई भी गवर्नर जनतांत्रिक शासन प्रणाली में बहुमत की सरकार को चोट पहुंचाए यह संभव ही नहीं था। बहुसंख्यक पक्ष के हाथ से दाना चुगने के अलावा गवर्नर के लिए कोई पर्याय उपलब्ध नहीं। ऐसे हालात में गवर्नर बहुसंख्यकों के हाथ की बस एक कठपुतली बन कर रह जाता है। इसीलिए कहा जा सकता है कि काँग्रेस प्रांत के गवर्नर्स काँग्रेस के रबर स्टैंप थे। अनुभव भी इसके खिलाफ नहीं हुआ।
बोर्डोली तहसील की कुर्क की गई जमीनें सरकारी खर्चे से पुराने मालिकों को लौटाने का प्रस्ताव काँग्रेस सरकार ने विधिमंडल में पारित करवा लिया। कुर्क की गई जमीनें निजी संपत्ति थी। उन्हें वापिस लौटाने में विशिष्ट व्यक्तियों को फायदा मिलने वाला था। वे विशिष्ट व्यक्ति एक विशिष्ट पार्टी के समर्थक थे। उन जमीनों को इस प्रकार लौटाने में किसी सार्वजनिक हित की साधाना नहीं होने वाली थी। इसके बावजूद गर्वनर द्वारा उस बिल को मंजूरी दी गई और कानून के रूप में उसे लागू किया गया और काँग्रेस पक्ष की जेबें भरीं। जनतांत्रिक व्यवस्था में अन्य किसी देश में इस प्रकार का लाभ किसी