167 30.12.1939 जनतांत्रिक प्रणाली से हिंदुस्तान को परहेज क्यों? - मुंबई - Page 285

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को मिलना संभव नहीं है। इस प्रकार की कोशिशों को निरस्त किया जाता। गवर्नर द्वारा उसे कभी मंजूरी नहीं दी जाती। लेकिन काँग्रेस के प्रांतों में यह हुआ। इसके लिए गवर्नर की दयनीय स्थिति ही कारण थी। इसीलिए, मेरा यही मानना है कि कानूनी प्रावधान के बावजूद जो गवर्नर अपने हकों की रक्षा नहीं कर सकता उससे अल्पसंख्यकों की रक्षा की उम्मीद पालना मूर्खता है।

मुसलमानों की शिकायतों के बारे में लगता है कि आज यहां मुझे उसका विवरण देने की जरूरत नहीं है। मुझसे पहले जो वक्ता बोले उन्होंने उसे बेहतर ढंग से स्पष्ट किया है। इसलिए यहां मैं केवल उस समाज की शिकायतों के बारे में बोलूंगा जिस अस्पृश्य समाज में मेरा जनम हुआ है। बल्कि, अस्पृश्यों पर होने वाले अत्याचारों का विस्तृत ब्यौरा भी मैं नहीं दूंगा। मैं अगर यह करने लगा तो आपको न केवल आज की रात, बल्कि अगले कई दिनों तक यही रुकना पड़ेगा। इसीलिए मैं केवल कुछेक बातों का ही जिक्र करने वाला हूं। सभी अल्पसंख्यक एक ही जहाज में भले यात्रा कर रहे हों, उनमें से कुछ पहले वर्ग के, कुछ दूसरे वर्ग के और कुछ तीसरे वर्ग के हैं। जबकि हम अस्पृश्य हमेशा सामान रखे जाने वाले तहखाने में ही यात्रा करने पर मजबूर हैं। इसमें कोई शक नहीं इस यात्रा में हमारा बेहद बुरा हाल है।

गोलमेज परिषद के बाद अंग्रेज सरकार द्वारा अस्पृश्यों को एक अनमोल तोहफा दिया था। उन्होंने हर प्रांत में अस्पृश्य समाज को अलग चुनाव-क्षेत्र देकर उनके लिए कुछ सीटें आरक्षित कर दी थीं। साथ ही, अन्य मतदाताओं के साथ मतदान का अधिकार भी उन्हें दिया गया था। इस योजना के कारण अस्पृश्यों को अपने भरोसे के प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार दिया गया था। इस योजना से अस्पृश्य संतुष्ट थे। लेकिन इससे गांधी को संतोष नहीं मिला था। अस्पृश्यों पर उपकार करने की इच्छा उनके मन में उभरी और इसीलिए उन्होंने तय किया कि अंग्रेजों द्वारा लागू की गई योजना को अगर बदला नहीं जाएगा तो वह प्राणार्पण करेंगे। अस्पृश्य समाज के हित से अधिक किसी के प्राणों का मोल नहीं हो सकता, यह मेरी पक्की राय है। लेकिन हमारे बीच भी कुछ ऐसे जिद्दी लोग हैं जिन्होंने हट किया कि गांधी के बगैर इस दुनिया में जीना व्यर्थ है। इसीलिए मुझे, ‘‘पुणे करार’’ को मंजूरी देनी पड़ी।

मेरी धारणा थी कि पुणे करार ‘जंटलमेन्स एग्रीमेंट’ है। काँग्रेस आदि सभी हिन्दु लोग स्पृश्यास्पृश्य वाद खत्म हुआ है मानकर उस करार का पालन करेंगे। ऐसे हालात पैदा होंगे कि अस्पृश्यों को लगे कि आगामी स्वराज अपना भी राज है। लेकिन नहीं। चुनाव आते ही काँग्रेस अपना असली स्वरूप व्यक्त करने लगी। पुणे करार द्वारा हमें मिली 15 सीटों में सौहार्द से इजाफा करने के बजाय उन 15 सीटों को प्रभावहीन कैसे बनाया जाए इसी कोशिश में काँग्रेस लग गई। इन सभी सीटों पर उन्होंने अनपढ़, मौका