265
परस्त किराए के टट्टू, गुलाम खड़े किए। उद्देश्य यही था कि चुनाव जीतने के बाद वे उनके हाथ की कठपुतली बन कर रहें। कहीं हमारे आश्रम के किसी झाडूवाले को और कहीं किसी काँग्रेसी नेता को खानसामे को तो कहीं अपने किसी चपरासी को उन्होंने चुनाव में उतारा। इस प्रकार के प्यादों को खड़ा कर चुनाव अपने बल पर लड़ने वाले स्वाभिमानी, सुशिक्षित उम्मीदवारों को हराने की उन्होंने ठान ली। अपने पैसों के बल पर अपने उद्देश्य को पूरा कर भी लिया। इसी बात से साबित हो जाता है कि मि. जिन्ना क्यों पृथक चुनाव-क्षेत्र पर अड़े हुए हैं। कोई खिलाफत में उम्मीदवार को खड़ा करे इस बात का दुख मुझे नहीं होता लेकिन नालायक लोगों को हमारे सिर पर नचाने के इनकी ढीढता के कारण गुस्सा आता है।
चुनावों के बाद जब सरकार बनाने का मौका मिला कम से कम तब क्या इन्होंने हिन्दुस्तान को मिले स्वराज में हमारा भी हिस्सा है इसका अहसास हमें हो ऐसा क्या कुछ किया?
हमने 15 में से 11 सीटें जीती थीं यानी अल्पसंख्यक अस्पृश्य समाज का बहुसंख्य हिस्सा हमारी तरफ था। मंत्रीमंडल बनाते समय हमें महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक होने के नाते पूछना चाहिए था। कूपर मंत्रीमंडल का सदस्यत्व सरकार कर मैंने गद्दारी भी नहीं की थी, मैं पूरी तरह से निष्ठावान रहा था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
इस बार काँग्रेस द्वारा प्रतिज्ञापत्र का बहना किया गया। उस प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किए बगैर किसी को मंत्रीमंडल में शामिल न करने की शर्त के पीछे यही भूमिका बताई गई कि मंत्रीमंडल एकरूप, एक लक्ष्य के प्रति समर्पित ना हो तो शासन चलाना मुश्किल होगा। सिद्धांत के तौर पर मैं इस बात को मानता हूं। लेकिन मुद्दे की बात यह है कि क्या काँग्रेस द्वारा इस सिद्धांत का पालन हुआ? असम में काँग्रेस का बहुमत नहीं था। वहां सत्ता के लालच में काँग्रेस ने इस सिद्धांत को ताक पर रख दिया। वहां प्रतिक्षा की शर्त को निरस्त कर उन्होंने संयुक्त मंत्रीमंडल बनाया। इसका यही मतलब निकलता है कि एकरूप मंत्रीमंडल काँग्रेस का निरंतर सिद्धांत न होकर सहूलियत वाला सिद्धांत है। साथ ही, प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर करने की कसौटी अगर काँग्रेस के प्रति निष्ठा थी तो कुछ लोग तो रातोंरात कागज पर हस्ताक्षर कर काँग्रेसनिष्ठ बन रहे थे और अपना उल्लू सीधा करवा रहे थे। यह काँग्रेस के प्रतिनिष्ठा थी या निष्ठा का ढोंग था? कोई भी ईमानदार व्यक्ति इस तरह का उथलापन नहीं कर सकता। अचरज की बात नहीं कि अस्पृश्यों ने उस पंथ को नहीं स्वीकारा।
अधिकार स्वीकृति के बाद भी काँग्रेस द्वारा कोई भूषणावह काम हुआ है ऐसा मुझे नहीं लगता। संक्षेप में कहना हो तो हाथ में खरबूजा आने पर बंदर जिस प्रकार की चेष्टाएं करते हैं उससे अलग उन्होंने कुछ किया नहीं। उनका राज चलाना Monkey and Melon