266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की चेष्टाओं से कुछ अलग नहीं था। कानून कुछ, घोषणापत्र कुछ और तथा आला कुछ और इस प्रकार का तमाशा लोकल बोर्ड के चुनावों में वह कर रहे थे। लक्ष्य उनका एक ही था- हमारे उम्मीदवारों को खत्म करना।
दलितों की उपेक्षा, दलितों के दुख उनसे दूर नहीं किए जाते। मैं कोई बहुत पुराने उदाहरण नहीं दे रहा। काँग्रेस के ही एक अखबार ‘नवा काक’ में पिछले मई माह में प्रकाशित खबर बता रहा हूं। कल्याण के पास वाले टिटवाला गांव में दो कुएं हैं। उनमें से एक कुएं से अस्पृश्यों ने पानी भरना शुरू किया। अस्पृश्यों को इस प्रकार पानी मिलना गांव के हिन्दुओं से सहा नहीं गया। अस्पृश्यों को पानी ना मिले इसलिए उन्होंने एक जुगत लड़ाई। दूसरे गांव से एक भंगी को बुलावा कर उन्होंने उसके हाथों उस कुएं में दो टोकरियां भर मैला फिकवाया। कितना अमानुषिक व्यवहार है यह! काँग्रेस के शासन में दिन-दहाड़े ऐसे अत्याचार जारी हैं। काँग्रेस सरकार उन पर पाबंदी नहीं लगाती। दूसरी घटना गुजरात की है। एक गांव में अस्पृश्यों ने दीपावली उत्सव मनाया इसलिए गांव के आप जानते हैं कि मुसलमानों से तिलक की पटरी अच्छी नहीं बैठती थी। बल्कि, हिंदू-मुसलमानों के बीच की खाई बढ़ाने का आरोप उन पर लगता रहा है। लेकिन जब मौंटेग्यू हिन्दुस्तान के भावी संविधान के बारे में चर्चा करने के लिए हिन्दुस्तान आए तब हिंदु-मुसलमानों की मांगे एक ही व्यक्ति द्वारा मोंटेग्यू के सामने रखी जा सकें इसलिए तिलक ने अपनी बैर-भावना को परे हटा कर उन्होंने लखनौ पैक्ट कराया।
आजकल इसके ठीक विपरीत हालात हैं। एक होकर अल्पसंख्यकों का मसला हल करने को लेकर गांधी राजी नहीं हैं। वह कहने लगे हैं कि अगर अंग्रेज सरकार हमारी मांगें नहीं मानती तो हम सत्याग्रह शुरू करेंगे। हलांकि समय रहते मैं उन्हें आगाह कर रहा हूं। कमाई हुई आय के बारे में जब टंटा चल रहा हो तब संपत्ति का प्रबंध ठीक से हो इसलिए कोर्ट द्वारा रिसीवर का इंतजाम किया जाता हैं हिन्दुस्तान के स्वराज के संदर्भ में अंग्रेज सरकार की भूमिका ऐसे रिसीवर की ही है। रिसीवर के जरिए सारी संपत्ति संयुक्त रूप से अपने हिस्से में करने की कोशिश के तहत रिसीवर को सताने के किसी भी काम को अल्पसंख्यकों के हकों के खिलाफ उठाया गया कदम माना जाएगा। परिणामस्वरूप अल्पसंख्यकों को भी न्याय पाने के लिए रिसवीर पर दबाव डालना पड़ेगा और अगर ऐसा करना पड़ा तो उसके लिए काँग्रेस ही जिम्मेदार होगी।
50-60 हजार लोग बड़ी शांति से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का यह भाषण सुन रही थी। भाषण पूरा होते ही तालियों की गड़गड़ाहट हुई। डॉक्टरसाहब तालियों की उस गड़गड़ाहट की ध्वनि में मंच से नीचे उतरे।