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* शाहू छत्रपति ने ब्राह्मण्य का किला ढहा दिया
30 दिसम्बर, 1939 को कोल्हापुर संस्थान दलित प्रज्ञा परिषद में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा-
स्वागताध्यक्ष, बहनों, भाइयों और आमंत्रित जनों,
अपने मुझे अध्यक्ष स्थान दिया इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। आज की परिषद का आयोजन अलग स्थितियों में किया जा रहा है। इस परिषद में अपनी जिम्मेदारी का अहसास रखते हुए ही भाषण करना होगा। आज हमारी हालत बेहद नाजुक है यह बात भूलनी नहीं चाहिए। बाहर से आए अंग्रेज राज्य के प्रजाजनों और स्थानीय, कोल्हापुर रियासत के प्रजाजनों की स्थितियों में बहुत फर्क है। यह बात भूलने से काम नहीं बनेगा। इस परिषद में हिस्सा लेने वालों को अपनी जिम्मेदारी को पहचानते हुए भी भाषण करना होगा। यह मेरा आपको अग्रिम इशारा है। जल्द ही 1939 का साल खत्म होगा और 1940 को नया साल शुरू होगा। कोल्हापुर के इतिहास में यह साल बेहद उलझन भरा रहा है। इस साल इस रियासत में कई परिषदों का आयोजन किया गया और आज की यह तीसरी परिषद है। पहली काँग्रेस प्रजा परिषद हुई जिसमें अध्यक्ष स्थान पर थे डॉ. पट्टाभिसीताराय्या। दूसरी रयत सभा की परिषद हुई जिसमें अध्यक्ष स्थान पर थे रा. मोरे। मेरे ख्याल से आप लोग भी इस परिषद में उपस्थित रहे होंगे। इन दो परिषदों में ही जुड़ कर हमारा कार्यक्रम क्यों नहीं हुआ यह विचार मन में आना स्वाभाविक है। यह तीसरी परिषद है और मैं इसका अध्यक्ष हूं इसलिए सीमक्षकों की आलोचना में उबाल तो आएगा ही। पिछले साल के मई महीने में जब पन्हाल मरे थे तब रयत सभा के चालकों ने मुझसे उनकी परिषद का अध्यक्ष स्थान स्वीकारने का आग्रह किया।
मैंने उनसे सोचने के लिए दो घंटों का समय मांगा। उन दो घंटों में मैंने कोल्हापुर की राजनीति के बारे में जानकारी ली। सोच-विचार के बाद मैंने तय किया कि रयत सभा का अध्यक्ष स्थान न स्वीकारना ही ठीक रहेगा। आज की परिषद कर आप अपनी खिचड़ी अलग क्यों पका रहे हैं यह पूछने का हक कम से कम रयत सभा बालों को तो नहीं ही है। उन्होंने भी प्रजा परिषद के बाद ही अपनी परिषद की थी। फिर अगर हमें अलग परिषद लेनी हो तो उसमें गलत क्या है?
प्रजा परिषद के चालकों को भी मेरी सहानुभूति की दरकार थी। मेरी राय में प्रजा
* जनताः 13 जनवरी, 1940