168 30.12.1939 शाहू छत्रपति ने ब्राह्मण्य का किला ढहा दिया - कोल्हापुर - Page 289

268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

परिषद का उद्देश्य प्रजा का कल्याण न होकर कोल्हापुरवासियों को नफरत करना था। जाहिर है कि उनके आंदोलन के बारे में मुझे सहानुभूति महसूस न हो। कोल्हापुर रियासत नंदनवन तो नहीं है, मैं भी यह बात मानता हूं। लेकिन कोल्हापुर के आस-पास कई छोटी रियासतें है। और उनकी प्रजा का भी जब दमन हो रहा हो तो केवल कोल्हापुर में ही आंदोलन करने वालों की नीयत पर शक होना क्या लाजिमी नहीं है?

कोल्हापुर के बारे में एक बात बिल्कुल तय है इस बात के बारे में अस्पृश्यों को और मुझे भी गर्व है। यह बात है कि स्व, शाहू महाराज ने कोल्हापुर में ही जनतंत्र की नींव डाली। हम गो-ब्राह्मण प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंति मानते हैं। शिव छत्र्सवति ब्राह्मण्य को नष्ट नहीं कर पाए। अपने राज्याभिषेक के लिए सोना देकर काशी से उन्हें गागाभट्ट को बुलाना पड़ा। कहना पड़ेगा कि ब्राह्मण्य को नेस्तानाबुत करने में स्व. शाहू छत्रपति शिवाजी से बढ़कर थे। शाहू राजा को वेदोक्त अधिकार नहीं है कहने वाले ब्राह्मण् ों को पुणे के लोकमान्य तिलक का और पुणे की भट्ट शाही का समर्थन प्राप्त है यह जानते हुए भी उन्हें शाहू छत्रपती ने ठोकर मार दी। इस बात को भुलाया नहीं जा सकता। स्व, शाहू छत्रपति महाराज में कुछ बुरे गुण भी होंगे और मुझे बताइए कि कौन-सा राजा निर्दोष है? केवल दोषों को देखने में कोई मतलब नहीं है। ब्राह्मण्य खत्म होने तक समाज की उन्नति संभव नहीं है। ब्राह्मण्य नष्ट करने की उन्होंने जोरदार कोशिश की इसीमें उनका बड़पन है। स्व. शाहू छत्रपति ने समाज में व्याप्त विषमता को नष्ट करने की कोशिश की और ब्राह्मण्य का किला ढहा दिया यह कोई छोटी बात नहीं है। मेरे सार्वजनिक जीवन की शुरूआत स्व. छत्रपति शाहू महाराज की अध्यक्षता में हुई माणगांव की परिषद में उनके आदर्श के पालन से ही हुई यह मुझे यहां बताना ही पड़ेगा। उन्हें और मुझे जो प्रिय है उस समानता के प्रचार के लिए उन्होंने रु. 2500 देकर मुझे हमेशा के लिए अपना ऋणी बनाया। इसी कारण मैंने प्रजा परिषद से संबंध नहीं बनाए यह भी जाहिर है। रयत सभा की बुनियाद भी शुद्ध नहीं है। यही सोचकर मैंने उनकी सभा का अध्यक्ष स्थान स्वीकारने से मना किया यह अलग से बताने की जरूरत नही है। रयत सभा का उद्देश्य प्रजा का कल्याण न होकर राजाओं की जी हुजूरी करते हुए अधिकारियों की आपसी लड़ाइयां लड़ते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करना है। संस्थान के सभी लोग महाराज की प्रजा है। समूची प्रजा समदुखी तो नहीं ही है। प्रजा के कुछ लोग सुखी है और कुछ लोग दुखी है। इन सुखी और दुखी लोगों को एक ही मानने में क्या तुक है? इस तरह सबको एक मानने से क्या एकमुख से मांगे रखी जा सकती हैं? बहनों और भाइयों, दुखी लोगों को एकमुख से अपनी मांगे रखना संभव हो इसके लिए आज हमने यह दलित प्रजा परिषद बनाई है। हम सभी राजनिष्ठ प्रजाजन इक्ट्ठा हुए हैं। प्रजा परिषद में मराठों की ही भरमार थी। उसमें एक भी अस्पृश्य नहीं था। राजनिष्ठा के कारण अस्पृश्यों का प्रजा परिषद को विरोध था।

अब हम यह देखें कि हम रियासत की प्रजा कैसे बंटी है। इस रियासत की कुल