168 30.12.1939 शाहू छत्रपति ने ब्राह्मण्य का किला ढहा दिया - कोल्हापुर - Page 291

270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कहा जा सकता है कि कोल्हापुर की इलाका पंचायत और म्युनिसिपालिटी की संस्थाओं में अस्पृश्यों के प्रतिनिधि नहीं हैं। प्रातिनिधिक संस्थाओं से जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधि लेना आज के युग में सर्वमान्य बात है अब यहां के हालात क्या हैं देखिए। इलाका पंचायत में 288 सदस्य हैं जिनमें एक भी अस्पृश्य सदस्य नहीं है। म्युनिसिपालिटी में अस्पृश्यों के केवल दो ही प्रतिनिधि लिए गए हैं। अब नया विधिमंडल बनेगा। उमीद करते हैं कि कम से कम उसमें हमारे हकों की जैसी आज तक होती आई है वैसी अनदेखी नहीं होगी। मुझे कोल्हापुर रियासत से काफी उम्मीदें थीं। लेकिन इस रियासत ने भी मुझे काफी निराश किया है। छात्रपति के राज में हम अस्पृश्यों के हितों में निरंतर वृद्धि होती जाएगी ऐसी मुझे बेहद उम्मीद थी। लेकिन इस रियासत ने भी मुझे निराश ही किया है यह बड़े दुख की बात है। आखिर में, मैं महाराज को दो बातें बताना चाहता हूं। या तो वे खुद राज्य की बागडोर सम्हालें या प्रजा को सारे अधिकार देकर जनतंत्र स्थापित करें। प्रजा को नौकरशाही के हवाले बिल्कुल ना करें। जरूरी नहीं कि जनतंत्र हमेशा कल्याणप्रद ही हो। यह बात तुर्कस्तान, इटली और जर्मनी की आज की एकसूत्रीय राज्यपद्धति से साबित होती है।

कोल्हापुर की राज्य मराठों का होने के बावजूद आज की परिषद पर अधिकारी खफा मर्जी है। रयात सभा का अध्यक्ष स्थान में स्वीकारूं इसलिए मुझे मजबूर करने की कोशिशें जारी हैं। मेरे आस-पास के अधिकारी मुझे भूल चुके हैं इसी से आप जो समझना है वह समझ सकते हैं। आज की सभा के लिए दरबार से 100 रुपए और म्युनिसिपालिटी द्वारा 100 रु. दिए गए हैं। इन रुपयों के अलावा परिषद को कोई मदद नहीं मिली है। लोग आज की सभा में अपने मन से आए हैं। जुल्म जबरदस्ती से, गांव के पाटील द्वारा मार-पीट कर लोगों को यहां लाया नहीं गया है। सभा के साथ खोट यही है कि इस सभा पर हजारों रुपए जाया नहीं किए गए हैं। जाहिर है, फिर यह अधिकारियों को कैसे पसंद आएगी?

कोल्हापुर में मुझे एक विशेष बात पता चली है। चेलों से अधिक यहां नेताओं की संख्या भरपूर है। राज्य का चलन कुछ ऐसा है कि यहां कोई भी ऐरा-गैरा अधिकारियों के कान भर सकता है। सुना है कि दीवाणजी के पास अर्जी ई थी जिसमें यह जिक्र था कि इस कार्यक्रम के लिए मुझे अध्यक्ष के तौर पर ना लिया जाए। ऐसे हालात में दलित प्रजामंडल हमेशा बना रहेगा यह देखना आपका काम है। कई चीजें शुरू कीं लेकिन उनमें एक भी ढंग से चल नहीं रही ऐसा न होने दें। आपकी इच्छा थी कि आज की सभा में महाराज को मानपत्र दिया जाए। वह बात संभव नहीं हो पाई। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। आज की परिषद का मेला महाराज ने देखा इसीमें हम कृतार्थ भाव महसूस कर रहे हैं आपको महाराज के साथ राजनिष्ठ रहना है। मुझे यह भी लगता है कि महाराज परती जमीनें, देवस्थानों की जमीनें और शेरी जमीनें अस्पृश्यों में बंट कर उन्हें आर्थिक तौर पर आत्मानिर्भर बनाएं। अस्पृश्यों की शिक्षा के लिए अधिक धन देना रियासत का कर्तव्य है। अस्पृश्य लड़कियों के छात्रावास के लिए भी खुले हाथ से खर्च करें तो अस्पृश्य समाज का कल्याण होगा। आखिर में मेरा आपसे आग्रहपूर्वक निवेदन है कि दलित प्रजामंडल के संगठन को मजबूत बनाएं।