169 31.12.1939 मेरे बाद भी अपनी एकजुटता कायम रखना - नेरे (पनवेल) - Page 292

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* मेरे बाद भी अपनी एकजुटता कायम रखना

31 दिसम्बर, 1939 को कोल्हापुर से सातारा की यात्रा के दरमियान पड़ने वाले नेरे में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का स्वागत किया गया। स्वागत के लिए गांव के सभी महिला और पुरुष स्कूल में इक्ट्ठा हुए थे। स्थानीय नेताओं ने डॉ. बाबासाहेब का स्वागत किया। रा. बी. टी. कांबले नामक युवा और उत्साही सामाजिक कार्यकर्त्ता ने स्वागत का भाषण दिया। उसके बाद डॉ. बाबासाहेब ने उपस्थित महिला और पुरुषों को उद्देश्य कर भाषण दिया-

मैं स्वागत या मानपत्र का लालची नहीं हूं। कोई मुझे कोसे तब भी मुझे डर नहीं लगता। सार्वजनिक कामों में पैसों की जरूरत पड़ती है यह आप भी जानते हैं। गांधी जी ने एक करोड़ रुपयों का फंड इक्ट्ठा किया और वह सब खर्च हो गया इस बारे में आपने सुन रखा होगा। जनाब जिन्ना को भी सार्वजनिक कामों के लिए रुपयों की मदद मिलती ही होगी। मेरे समाज के आज तक मुझे रु. 5000 से अधिक मदद प्राप्त नहीं हो पाई है। यह बात गौर करने लायक है। अपनी गरीबी के कारण हमें धन की कमी के साथ ही काम करना पड़ेगा यह जाहिर बात है। हमें आपस में एका रखना होगा। फूट नहीं पड़ने देनी है। आज राजनीतिक हालात ऐसे पैदा हुए हैं कि गांधी, जिन्ना तथा अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के रूप में मैं-हमें कुछ पूछे बगैर हिन्दुस्तान का राजनीतिक मसला हल नहीं होता। अंग्रेज व्यक्ति डॉ. थॉमसन ने यह बात मुझे और गांधी जी को बताई है। काँग्रेस चाहे कुछ भी करे, कुछ भी कहे, राक्षस, राष्ट्रद्रोही, आस्तीन का सांप वगैरा कुछ भी कहे, वे मुझे खारिज नहीं कर सकते। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? मैं गांधी जी जैसा महात्मा नहीं हूं। मेरे साथ आप लोगों की अमेद्य एकता का कवच है। उसी के कारण मुझे बल प्राप्त हुआ है। इसीलिए, आप आपस में ना लड़ना। सम्मान पाने के लिए एक-दूसरे से स्पर्धा कर अलगांव ना पालें। यह बात ना भूलें कि मुफतखोरों की दुनिया इज्जत नहीं करती। सामाजिक कार्य के लिए रुपया इक्ट्ठा किया जाता है और कभी वह खर्च भी किया जाता है। मैं यह बात जानता हूं। हालांकि इस बात पर समाजकार्य रोका नहीं जा सकता। तालाब का मालिक पानी चखता ही है। हमें उसका बंदोबस्त करना होगा। लेकिन इस मामले में हमें व्यावहारिक नजरिया अपनाना होगा। काँग्रेस के एक करोड़ रुपयों के फंड का हाल क्या हुआ दुनिया जानती है। उसके बावजूद काँग्रेस का काम जारी है। आपसे मैं यहां कहूंगा कि आपसी छोटी-छोटी बातों को उलझ कर समाज में फूट ना डालें।

* जनताः 20 जनवरी, 1940