171 3.1.1940 महारों की कापफी जमीन और महारों की बस्ती गुलामी की ही निशानियां हैं - मेढे (सातारा) - Page 296

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का समय आया था लेकिन भगवान की कृपा से अब वह टल गया है। इसके बावजूद मैं ज्यादा देर तक बोल नहीं पाऊंगा। ऐसे समय सम्माननीय भाऊराव गायकवाड़ और श्री चित्रे देवदूत की तरह ही मुझे मिले। ऐन समय पर दौड़ते हुए आकर भाषण देने की मेरी जिम्मेदारी को उन्होंने हल्का किया। उनके इस काम के लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं। अब मैं महार वतन और सातारा के अस्पृश्य छात्रों के छात्रावास के बारे में दो शब्द बताना चाहता हूं। लेकिन इससे पूर्व श्री डबाले के आज के भाषण के बारे में मैं पहले सोचना चाहता हूं। श्री डबाले ने आज की परिषद के स्वागताध्यक्ष श्री सावंत की परोक्ष रूप से थोड़ी आलोचना की है। श्री सावंत के काम के बारे में मैं जानता हूं और उन्होंने जो काम किया है वह अमूल्य है। भरी सभा में कहा गया कि अखबार में उनका नाम नहीं छपता इसलिए उनके काम का ऊर्जा कम है ऐसा भरी सभा में कहा गया। इस बारे में मैं खुद अपना उदाहरण आपको देने वाला हूं। पिछले सवा दो सालों में विधिमंडल में मैंने केवल चार ही भाषण किए हैं। मैंने कभी सवाल भी नहीं पूछे। अनुपस्थित सदस्यों में भी मेरा नाम सबसे ऊपर होगा। ऐसे में उबाले की नजर में मा., उबाले की नजर में मा. सावंत से भी अधिक गया-गुजरा ठहरूंगा मैं, है ना?

विधिमंडल में कुल 175 सदस्य हैं। वे विभिन्न पक्षों के हैं। सभी पक्षों के सभी सदस्य वहां भाषण तो नहीं करते। वहां चुनिंदा लोग चुनिंदा भाषण देते हैं। विधिमंडल में काँग्रेस के 92 सदस्य हैं। अगर मा. उबाले को यह पता होता कि उनमें से कितने लोग भाषण देते हैं तो वे मा. सावंत की आलोचना नहीं करते। श्री सावंत ने पिछले सवा दो सालों में एक कलर्क, छह तलाठी, ग्यारह चपरासी, इक्कीस स्कूल मास्टर, सड़सठ पुलिस, छह अध्यापिकाएं और उन्नीस पोस्टमेनों को नौकरियां दिलाईं। उनका यह काम क्या कम महत्वपूर्ण है? महारों पर स्पृश्यों को खुन्नस है। कहा जाता है कि महार शिकायतें करते हैं। ऐसी स्थितियों में 131 महारों को नौकरियां दिलाना क्या कम महत्वपूर्ण काम है? यह आसान काम बिल्कुल नहीं है। इसके बावजूद मा. उबाले इस प्रकार की शिकायत करते है। मेरा उनसे यह सवाल है कि सातारा के अस्पृश्य छात्रावास की मदद करने का जो वचन उन्होंने दिया था क्या उन्होंने उसका पालन किया? मंदिर पर कलश चढ़ाने की जिनकी इच्छा हो कम से कम उन्हें तो मंदिर की नींव नहीं खोद डालनी चाहिए। घातक आलोचना कर उनकी कमियां गिनाने से क्या मिलेग?

अब हम महारों की माफी जमीन के बारे में सोचते हैं। अपने पैरों में बंधी माफी जमीन की बेड़ी तोड़ने के अलावा अब हमारे सामने कोई उपाय नहीं है। माफी जमीनें हैं तब तक हम गुलाम ही रहेंगे। इसलिए इन वतनों को खत्म कर देना होगा। हर महारों की बस्ती इंसानों का पांजरापोल ही हैं। महारों का वतन और उनके रहने की जगह यानी महार-बस्ती परंपरा से चली आई गुलामी की प्रतीक हैं। वे नष्ट होनी ही चाहिए। स्पृश्यों