276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
द्वारा उन्हें खत्म करने का भले विरोध हो लेकिन नए स्वराज में इन्हें नष्ट करना ही होगा। इन्हें नष्ट किए बगैर मैं नहीं रहूंगा। लेकिन वतन नष्ट होने तक उसकी बेडि़यां ढीली करने की कोशिशें हमें करते रहना होगा। आंदोलन कर अपने पर चढ़ाए गए अतिरिक्त लगान के बोझ को हमें बंद कराना होगा। जो गांव के कामगार हैं उन्हें तनख्वाह नौ करी पर रखना चाहिए। गांव से बाहर के कामों के लिए उन्हें आठ आने की दिहाड़ी मिलनी चाहिए। छह महीनों में गांव कामगारों की शिकायतें अगर हल नहीं की गईं तो गांव-कामगारों को चाहिए कि वे पूरे इलाके में हड़ताल कर देनी चाहिए। भले कुछ हो, आप अपनी जमीनें ना छोड़ें।
अब हम मा. सावंत द्वारा सातारा में चलाए जा रहे अस्पृश्य छात्रावास के बारे में सोचते हैं। आंदोलन करते हुए हम अस्पृश्य नेताओं की हालत बड़ी दयनीय हो जाती है। अन्य वर्गों के राजनीतिक नेताओं का इतना बुरा हाल कभी नहीं होता। मि. जीन्ना कभी छात्रावास चलाने के झमेले में कभी पड़ेंगे नहीं। हम अस्पृश्यों को आंदोलन करते हुए बहुरूपी बनना पड़ता है। हर जगह मारे-मारे घूमना पड़ता है। हमें छात्रावास बनाने पड़ते हैं। टुंडे की पत्नी को उसे हर-रोज नहलाना पड़ता है बिल्कुल ऐसी ही हमारी गत होती है। इस बारे में आप में से अध्यापकों पर मेरा कटाक्ष है। वे पढ़े-लिखे होते हैं। हमारे आंदोलन के कारण उन्हें नौकरियां मिलती हैं मेरा उन पर आरोप है कि इसके बावजूद वे बेफिक्र रहते हैं।
किसी के मन में सवाल उभर सकता है कि सातारा में मा. भाऊराव पाटील का एक छात्रावास जब है सावंत के दूसरे छात्रावास की जरूरत क्या? लेकिन इसका जवाब बेहद आसान है। मा. पाटील के छात्रावास से बाहर निकलने वाले अस्पृश्य छात्र भीष्म-द्रोण की तरह ‘अर्थस्य पुरुषों दासः’ की तरह गुलामी की मानसिकता वाले नहीं होंगे। जाहिर है कि वे कच की तरह होंगे। हमारे छात्रों को संपत्ति का गुलाम नहीं होना चाहिए। इसीलिए मा. सावंत के छात्रावासों जैसी-संस्थाओं की बहुत जरूरत है।