173 4.2.1940 देश हित के लिए निजी हित त्यागने को मैं तैयार हूं - मझगांव (मुंबई) - Page 299

278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* देशहित के लिए निजी हित त्यागने को मैं तैयार हूं

4 फरवरी, 1940 को मझगांव, मुंबई में दुर्घटना से बचने के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का अभिनंदन करने हेतु एक सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा में बोलते हुए डॉ. बाबासाहेब ने कहा-

अध्यक्ष महाराज, बहनों और भाइयों,

दुर्घटना से बचने के लिए आपने मेरा अभिनंदन किया इसके लिए मैं आपका हृदय से कृतज्ञ हूं। इंसान को लंबे समय तक जीना चाहिए ऐसा मैं नहीं मानता। आदमी बूढ़ा हुआ, दांत गिरे, हाथ-पैर कांपने लगे, सठिया गए तो फिर जीने का क्या मतलब? स्व. गडकरी ने सच ही कहा है, ‘‘जब तक जीने से कुछ हासिल हो तभी तक जीना चाहिए।’’ लेकिन एक बात मेरे मन को कुरेद रही है। मेरा काम अधूरा रह गया है। उस काम की नींव पवित्र है, उसमें ईमानदारी भी काफी है, मुझे अच्छे सहयोगी मिले हैं। यह काम जब तक अधूरा है तब तक कुछ और समय तक जीना मुझे आवश्यक लगता है। मैं बचा इसका असली संतोष इसी बात में है कि आपको इस घटना से संतोष मिला है। मैं जब मुंबई में आया तब दुर्घटना से मेरे बचने पर मुझे बधाई देने आए कई लोगों करो फूट-फूट कर रोता हुआ देखकर लगा कि अच्छा हुआ मैं बच गया। आजकी अभिनंदन की सभा में असल में अगर देखा जाए तो बोलने की ज्यादा जरूरत नहीं है। लेकिन वर्तमान स्थितियों के बारे में मैंने अगर कुछ नहीं कहा तो यहां प्रचंड जन-समुदाय को निराशा होगी इसीलिए हम सभी की आस्था से संबंधित विषय पर बोलना जरूरी है।

पिछले दो महीनों से काँग्रेस ने दो पत्रिकाएं निकाली हैं- ‘पूर्णिमा’ और ‘नवयुग’। लगता है कि ये दोनों पत्रिकाएं खास मेरे लिए ही निकाली गई हैं। इस तरह से उन्होंने मेरा सम्मान किया है। दिन भर काम करने के बाद उस पत्रिका के लेख पढ़ कर मेरा काफी मनोरंजन होता है। हमारे बारे में लोग लगातार लिखते रहते हैं। हम ना होते तो उनका जीवन अलोना हो जाता। देखकर मेरे मन में इस बात पर स्वाभिमान जागता है कि अगर मैं न होता तो ये पत्रिकाएं बिकती कैसे? चिंता में मुझे कभी-कभी चिरंजीवि होने का ख्याल आने लगा है। ‘गावमामा’ ने अगर मेरा फोटो छापा तो उससे क्या साबित होता है? हो सकता है आगे चलकर मैं संन्यास लूं, कया पता? एक खत में कहा गया

* जनताः 10 फरवरी, 1940