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है कि मैं बैठे-बैठे एक शेर भजिए खा जाता हूं। तो क्या नए जमाने में भजिए खाना पाप है? मुझे लगता है भजिए खाने से किसी की इज्जत को कोई धोखा नहीं पहुंचता। इस प्रकार की आलोचनाएं पढ़ कर मैं हंसता हूं। मेरे भाइयों को भी मेरी सलाह है कि वे हंसना सीखें। आलोचना जरूरी कीजिए लेकिन मन में दुर्भावना ना पालिए। ये आलोचना पढ़ कर मैं कैसे हंसता हूं, मैं भी उस पर चुटीला व्यंग्य कैसे कर सकता हूं इस बारे में मेरे यहां उपस्थित मेरे मित्र संपादक मा. तटणीस बताएंगे। मेरे कुछ अन्य आलोचक भी है। देशहित के लिए मैं निजी हित त्यागने के लिए तैयार हूं। लेकिन मैं अस्पृश्य समाज के हित को त्यागने के लिए कतई तैयार नहीं हूं। हो सकता है यह किसी को अपनी जाति के प्रति मेरा झुकाव लगे, मुझे परवाह नहीं। * मैं उनका हित कभी भूल नहीं सकता। अस्पृश्यों का मसला केवल मजदूरों या किसानों का मसला नहीं है। मिल के कपड़ा विभाग में अस्पृश्य के काम करने पर मजदूरों को ही आपत्ति होती है। काँग्रेस ने जो रैयतों के बारे में कानून बनाया है उससे भी अस्पृश्य किसानों का फायदा संभव नहीं। क्योंकि उनके पास जमीनें ही नहीं हैं। जिनके पास जमीनें ही नहीं है उन अस्पृश्य किसानों का हित यह कानून कैसे कर सकता है? अस्पृश्य किसान और मजदूर हैं। लेकिन हर किसान और मजदूर अस्पृश्य नहीं है यह भी सच है।
अस्पृश्य मजदूर डोंगे, निमकर के झंडे तले क्यों नहीं जुटते? अपनी यूनियनें अलग क्यों बनाते हैं? इसकी असली वजह यही है कि सभी मजदूर एक जैसे नहीं हैं। मजदूर और किसान भी जाति-भेद से ग्रस्त हैं। स्पृश्य मजदूर और किसानों को अस्पृश्य मजदूर और किसानों से नफरत करने में कोई दिक्कत महसूस नहीं होती। स्वतंत्र लेबर पार्टी अस्पृश्यों का मसला कभी भी छोड़ने वाली नहीं है। मैं खुद महार हूं, अस्पृश्य हूं। स्पृश्य लोग पत्थरों को, पेड़ों-झंखडों को, पशु-पंछियों को, सांप-बिच्छुओं को भी भगवान मानेंगे लेकिन किसी अस्पृश्य को वे कैसे अपना नेता मान सकते हैं? ज्यादातर मजदूर और किसान स्पृश्य ही हैं यह बात आज की स्थितियों में कैसे भुलाई जा सकती है?
क्या हमारे पक्ष के संगठन नहीं हैं? या फिर मा. प्रधान और मा. मडकेवुवा जैसे कामगार नेता हमारे पास नहीं हैं? हमारे पक्ष में कमी किस बात की है? लेकिन हम सनातनी नहीं हैं। हमारा पक्ष अस्पृश्यों का पक्ष है। तो फिर स्पृश्यों को उससे परहेज तो होना ही है।
हमारे मडकेबुवा महार हैं। उनकी जानकारी भाई, संगठन, लड़ने की नीति आदि तक ही उन्हें पता होगा। बूइर्वा, प्रोलेटरिएट, टेंपो आदि भारी-भरकम शब्द कैसे उनके पल्ले पड़ेंगे? अगर ये शब्द उनके पास नहीं हैं तो फिर वे कामगार नेता कैसे बन सकते हैं? लेकिन वे असली नेता हैं। म्युनिसिपालिटी के कामगारों से पूछिए। रेलवे के पोर्टरों से
* उपलब्ध अंक में अगली चार पंक्तियां अस्पष्ट हैं।