282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का यह झंडा हमेशा फहरता रहे। झंडे का आकार सुविधानुसार छोटा या बड़ा किया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस की प्रतिज्ञा
‘‘हम प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इंसानियत के अधिकार हासिल करेंगे। स्पृश्य समाज द्वारा हमें बहिष्कृत किया गया है। वह समाज हमें अनाज, पानी और जीवन के लिए आवश्यक अन्य सुख साधन तक पाने नहीं देता। उस समाज ने हमें महार बस्ती में कैद कर दिया है। उद्योग-व्यवसाय करना या अपनी काबिलियत के अनुसार नौकरी पाना भी उन्होंने हमारे लिए नामुमकिन कर रखा है। हमारी बुरी हालत की पूरी जिम्मेदारी स्पृश्य समाज पर ही है। हमारे इंसानी अधिकार तक छीनने वाले इस समाज के हाथ में समूची सत्ता देना यानी बंदर के हाथ में पलीता देने के समान है।
काँग्रेस सरकार ने महार ईमानदार कामगारों से बिना वेतन के काम करवाया और 50 हजार अस्पृश्य कामगारों पर लादी गई सनातनी बेगार खत्म करने के लिए कुछ नहीं किया। क्या इसी बात से काँग्रेस सरकार का हरिजन प्रेम अच्छी तरह व्यक्त नहीं होता? काँग्रेस सरकार के राज्य में भी हमारे समाज का पहले की तरह ही शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शोषण जारी था। इसीलिए हमारी यह पक्की राय बनी है कि हमारे दुश्मनों के हाथ में राज्य की पूरी सत्ता देना हमारे नजरिए से बेहद जोखम भरा है।
इंसानियत के अधिकार पाने का रास्ता हमारे लिए यही है कि हम देश की राजनीति में अपना हिस्सा पा लें। इसीलिए हम एक बार फिर प्रतिज्ञा करते हैं कि अस्पृश्यों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सा दिला कर उन्हें मानव अधिकार दिलाएंगे।
हम मानते हैं कि जाति आधारित भेद-भावों को खत्म कर ऐसे संविधान का निर्माण करना हमारा कर्तव्य है जिसके तहत जाति, धर्म, वर्ण आदि ऐच्छिक व्यवहार में दखल न दें।
डॉ. अम्बेडकर द्वारा हमारे समाज को राजनीतिक सत्ता दिलाने के लिए जो लड़ाई शुरू की है उसे हम मानते हैं। डॉ. बाबासाहेब की आज्ञा के अनुसार हम इस लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे यह हमारी प्रतिज्ञा है। ख्1,
चवदार तालाब की लड़ाई के संदर्भ में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को न्याय पाने के लिए हाईकोर्ट तक जाना पड़ा था। इस संघर्ष में अस्पृश्यों की जीत हुई। इस बारे में पूरी
खबर 27 मार्च, 1937 की ‘जनता’ में प्रकाशित हुआ है। वह इस प्रकार है-
- जनताः 16 मार्च, 1940