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चवदार तलाब से संबंधित संघर्ष में प्राप्त विजय 1927 के मार्च महीने की 19 तारीख को डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने स्वाभिमान और इंसानियत के नाते मिलने वाले अधिकार पाने के लिए संघर्ष छेड़ा था और अस्पृश्य समाज की सर्वांगीण उन्नति की शुरूआत की थी। महाड़ के चवदार तालाब का पानी पीने के समान अधिकारी होने की मांग करते हुए अस्पृश्य भाइयों ने आंदोलन छोड़ा तो वहां के सनातनी और कुछ विघ्नसंतोषी स्पृश्य लोगों ने इस समान अधिकार की मांग करने वाले आंदोलन का विरोध किया। उन्होंने कानूनन अस्पृश्यों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक आदेश प्राप्त करते हुए समान अधिकार की इस लड़ाई का विरोध किया था। महाड़ के सब-जज द्वारा इस दावे को निरस्त किए जाने पर इन्हीं सनातनी लोगों ने उनके खिलाफ ठाणे कोर्ट में अपील की। वहां कई दिनों तक इस मुकद्दमे का कामकाज चला और आखिर इस कोर्ट द्वारा भी निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा तो महाड के स्पृश्य लोगों ने एक बार फिर कोशिश कर अस्पृश्य समाज के समान अधिकार पाने की लड़ाई को जड़ से खत्म करने की कोशिश में मुंबई हाईकोर्ट में अपील की। वहां यह अपील लंबे समय तक लटका रहा। लेकिन आखिर पिछले महीने उस पर सुनवाई शुरू की गई। इस मुकदमे में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर और अन्य चार अस्पृश्य प्रतिनिधियों को प्रतिवादी किया गया था। कोर्ट द्वारा इस मुकदमे से संबंधित सभी हकीकतों के बारे में जैसे कि वहां के हालात, इस तालाब का ऐहिसिक महत्व और पुराने रीति-रिवाजों के बारे में जानकारी ली। कुछ दिनों तक निर्णय को लंबित रखने के बाद आखिर 13 मार्च, 1937 को न्या ब्रमफील्ड ने इस मुकदमे से संबंधित अपना निर्णय सार्वजनिक किया। निर्णय में उन्होंने बिल्कुल साफ शब्दों में बताया कि चवदार तालाब की मालिकीयत के बारे में अब वादी का कुछ भी कहना नहीं लेकिन लैंड रेवेन्यू कोड के मुताबिक चवदार तालाब सरकार की संपत्ति था और प्रतिवादी द्वारा दिए गए प्रतिपादन के मुताबिक डि. म्यु. एक्ट के मुताबिक फिलहाल इस तालाब की मालिकीयत महाड़ म्युनिसिपालिटी के पास है। इस तालाब का पानी मुसलमानों जैसे अहिंदु लोग भी इस्तेमाल करते हैं। इससे स्पष्ट है कि इस तालाब को इस्तेमाल करने का अधिकार केवल स्पृश्य लोगों को ही है ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसके बावजूद वादी का कहना है कि प्राचीन समय में हम तालाब का पानी भरने और पीने की अस्पृश्यों को मनाही थी। लेकिन इस प्राचीन रूढि़ के कारण वादी को आज यह कहने का कानूनी अधिकार नहीं है। साथ ही इस प्राचीन रूढि़ के होने की बात भी सप्रमाण साबित नहीं कर पाया है। इस प्रकार इस मुकदमे में आखिर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जीत हुई और महाड के चवदार तालाब का पानी आगे से कानून अस्पृश्यों के लिए पीने और इस्तेमाल करने के लिए उपलब्ध हुआ। दस वर्ष डॉ. बाबासाहेब ने अस्पृश्य समाज की सर्वांगीण उन्नति के लिए जो आंदोलन छेड़ा था उसमें आज उन्हें अपूर्व सफलता मिली है। किसी भी मुश्किल