288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थे यह आप में से कई लोगों को याद होगा। 1927 की सभा में जो लोग उपस्थित थे वे आज की सभा में जीवित होते हुए भी गैर-हाजिर रहें यह संभव नहीं है।
चौदह साल पहले इसी थिएटर में एक मामुली सभा हुई थी। उस सभा में अस्पृश्यों के लिए सार्वजनिक तालाबों से पाबंदी हटाने का प्रस्ताव पारित किया गया था। इस प्रस्ताव के लिए सभी पक्षों से समर्थन मिला था। इस समर्थन के कारण हमारे अनंतराव चित्रे की हालत ‘क्या करूं क्या ना करूं’ सी हो गई थी। हम सभी लोग उत्सुक भेड़ों की तरह सामुदायिक रूप से पानी पीने के लिए तालाब पर गए थे। हमारे लोगों द्वारा वहां भरपेट जलपान किए जाने के बाद हम कृतार्थ होकर अपने-अपने ठिकाने चले गए थे। उस दौरान मेरा रहने का प्रबंध ट्रॅवलर्स होम में किया गया था। मैं और मेरे साथी सरकारी बंगले पर गए। उस दिन हमारे खाने का कोई प्रबंध नहीं किया जा सका। दोपहर के समय लहुलुहान अस्पृश्यों के दर्शन जरूर हुए थे। महाड़ के स्पृश्यों ने अस्पृश्यों को अकेले में पकड़ कर पीट दिया था। स्पृश्य कातिलों का जुलूस दोपहर चार बजे के आस-पास हमारी ओर बंगले पर आया था। इस मोर्चे में करीब दो हजार लोग शामिल थे। उन्हें यह कह कर उकसाया और भड़काया गया था कि डॉ. अम्बेडकर आज विश्वेश्वर के मंदिर में जाने वाले हैं। लेकिन उस समुदाय के साथ उस दिन पुलिस अधिकारी भी थे। इसलिए हमारी मृत्यु टली। उस समय पुलिस अधिकारी भी डर गए थे। उन्होंने मुझे साफ तौर पर कहा था कि या तो आप मुंबई चले जाएं या पुलिस के दफतर में आकर रहें। जख्मी लोगों को उनके हाल पर छोड़ कर मुंबई जाना मेरे लिए संभव नहीं था। इसलिए मैं पुलिस के दफतर में रहने लगा। श्री सुरबा टिपणीस को भी लोगों से डर रहा था। इसके बावजूद वे चोरी-छिपे मेरे लिए थोड़ा-बहुत खाना ले आया करते थे। वीर गांव का बूढ़ा वीरकर लेकिन हर रोज मेरे लिए खाना लेकर आता था।
1927 के दिसम्बर, महीने में हमने एक बार फिर सत्याग्रह के लिए सभा बुलाना तय किया। हम पर मनाही हुक्कम लगाया गया। प्रतिबंधात्मक आदेश तोड़ने के लिए लोग बिल्कुल तैयार थे लेकिन हमारी सभा ने निर्णय लिया कि हमें कानूनी राह को अपनाते हुए ही आगे बढ़ना है। कई मित्र नाराज हुए। दुश्मन कहने लगे कि हम कारागार से, सजा से डरते हैं। लेकिन इतिहास ने साबित कर दिया है कि हमारी नीति ही सही थी, जो राह अपनाई थी वही सही थी।
आज की सभा में स्पृश्य, अस्पृश्य, हिंदू, मुस्लिम कंधे से कंधा सटाए बैठे हैं। क्या इससे साबित नहीं होता कि जो रास्ता हमने अपनाया था वही सही था?
आज हम यहां अस्पृश्यों का स्वतंत्रता दिवस मानने के लिए इक्ट्ठा हुए हैं। अस्पृश्यों की आजादी जयादातर सामाजिक समस्या ही है। आज मैं इस समस्या के संदर्भ में सिंहावलोकन करने वाला हूं। सामाजिक बदलावों के बारे में मैं जो आज सोचने वाला