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हूं। आज की सभा में मैं राजनीतिक आंदोलन के बारे में कम ही सोचूंगा।
केवल राजनीतिक आजादी पाने भर से जनता का कल्याण होगा यह भ्रम है। अनुभव हमें बताते हैं कि दुनिया के कई आजाद देशों की जनता आज भी दुखी और परेशान है। रूमानीया, अल्बेनिया, सर्बिया और युगोस्लाविया देश आजाद हैं, लेकिन क्या वे सुखी हैं? फिनलैंड और रशिया का उदाहरण हमारे सामने ही है।
जिस देश के सामाजिक हालात बेहतर होते हैं, जहां व्यवस्था कायम रहती है वही राष्ट्र आजादी पाकर उसे ठिकाए रख सकता है। हिंदी नेता स्व. सर टी. माधव राव ने एक जगह कहा है कि, ‘‘बुरी सामाजिक स्थितियां ही जनता के दुख के लिए जिम्मेदार होती हैं।’’ आर्यों की संस्कृति ने हमारे समाज की चौखट को हड्डी की तरह सख्त बना दिया है। उसमें लचक बिल्कुल नहीं बची है। हालात के अनुसार उसमें फेरबदलाव लाना संभव नहीं होता। आर्य संस्कृति को श्रेष्ठ मान कर उसे दिल से लगाए रखने में कोई मतलब नहीं। इस संस्कृति की मानी गई श्रेष्ठता निरा भ्रम है। उनकी यहा संस्था से ही आर्यों की अमानुष हिंसक मानसिकता का पता चलता है। आर्य यज्ञों में अनगिनत पशुओं की नृशंस बलि चढ़ाया करते थे। आर्य लोग पक्के सोमप्राशन करने वाले थे। उनके जितने शराबी लोग शायद ही कहीं मिलें। वे शूद्रों को तुच्छ मानते, महिलाओं को शूद्रों से हीन मानते थे। अपनी मां-बहनों की स्त्री-जाति को हीन मानने वाले आर्यों की संस्कृति का दर्जा कया था यह अलग से बताने की जरूरत ही नहीं है। इन्हीं आर्यों ने चार वर्ण बना कर समाज के टुकड़े कर दिए और शूद्रों को हीन स्थिति तक पहुंचाया। यही आर्य संस्कृति आज की हमारी हीन स्थिति का कारण बनी हुई है।
भगवान बुद्ध ने इन बिगड़े हालात को सुधारने की कोशिश की। उसने यज्ञ संस्था का विरोध किया। महिलाओं और शूद्रों की हालत में सुधार लाने की कोशिश की। शराब पीने पर भी पाबंदी लगा दी।
लेकिन ब्राह्मण धर्म ऐसे बुद्ध धर्म को सह नहीं सका। ब्राह्मण धर्म के विरोध में बुद्ध धर्म टिक नहीं पाया।
बुद्ध के बाद भी कई लोगों ने समाज सुधार की कोशिशें की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
हाल के समय में स्व. आगरकर और महात्मा ज्योतिबा फुले ने समाज में सुधार लाने की भगीरथ कोशिशें की। ये सभी अतिरथी-महारथी थक गए लेकिन हमारे पिछले पंद्रह सालों के आंदोलन को लेकिन लगता है कि कुछ हद तक सफलता मिली है। यह
खुशी की बात है।