174 19.3.1940 राजनीतिक आजादी पाते ही जनता का कल्याण होगा यह भ्रम है - महाड़ - Page 312

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नहीं रहेगा। ध्यान रखें, अब के बाद आपको भी जागना होगा। 70-80 प्रतिशत होने के बावजूद आप लोगों को केवल समाज की हमाली करने में जिंदगी अगर बितानी पड़ती हो तो मैं कहूं कि आपका कितना बुरा हाल है?

आप भले काँग्रेस में शामिल हों, काँग्रेस आपको आजादी से बरतने नहीं देगी। आपको काँग्रेस के गुलाम बन कर रहना होगा। हमारी स्वतंत्र लेबर पार्टी की बुनियाद महार ही है। धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से शोषित हमारे समाज के निम्न स्तर के लोगों में जागृति लाकर उसी पर स्वतंत्र लेबर पार्टी की बुनियाद रखी गई है। इसलिए हमारा यह हिस्सा हमेशा मजबूत ही रहेगा यह बात ध्यान में रखें।

आप हमें सीढ़ी बना, हमारा सहारा लेकर अपना काम शुरू करें। लेकिन आप अपनी अलग सीढ़ी बनाना ना भुलें। हम अस्पृश्यों के पक्ष से आपको अगर परहेज हो तो आप हमसे ना मिलें लेकिन हमने जो कछुए की पीठ तैयार की है उसका इस्तेमाल कर इस दुख के सागर को तर जाने से हिचकिचाएं नहीं। मेरा आपसे बस यही कहना है। ख्5,

‘‘अध्यक्ष के भाषण के बाद महाड तालुका, माणगांव और मुंबई के फोर्ट वाले हिस्से में रहने वाले कोलाबा वासियों ने डॉ. बाबासाहेब को रु. 318, रु. 210 और रु. 31 की थैलियां अर्पण कीं।

डॉ. बाबासाहेब ने घोषणा की कि इसमें से आधी रकम महाड के सुम्भेदार सवादकर बोर्डिंग को और बची हुई रकम स्थानीय कार्य के लिए दी जाएगी।

डॉ. जाधव के भाषण के बाद मडकेबुवा जाधव ने स्वतंत्र लेबर पार्टी के सदस्यों की संख्या बढ़ाने की जरूरत पर ध्यान दिलाया। सभा के अंत में दो अस्पृश्य बच्चों ने अस्पृश्य आंदोलन के लिए पोषक दो पद गाकर सुनाए। अंत में श्री पोतनीस ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।

आभार प्रदर्शक प्रस्ताव के बाद कुलाबा जिले के पृथक मजदूर पक्ष, महाड के सुभेदार सवादकर, बोर्डिंग, माणगांव तहसील के स्वतंत्र लेबर पार्टी, महाड के श्री सुरबा टिपणीस और श्री ओहोल मास्टर, श्री शंकरहोठ खुले और श्री भास्कर होठ खुले की ओर से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को फूलमालाएं अर्पण की गईं। उसके बाद सभा समाप्त हुई।

स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए श्री राधो दगडू ओहोल, विठोबा गणपत वरघरकर, देऊ रामा जोजी, और गुणाजी देवजी कोलकर ने बहुत मेहनत की इसलिए उनके प्रति जितना भी आभार प्रकट किया जाए कम है। ख्6,

  1. जनताः 30 मार्च, 1940

  2. तत्रैव