175 19.3.1940 मेरी राय में व्यवहार कुशलता और चारित्रिक संपन्नता ये दो महाराष्ट्रीय लोगों के गुण हैं - महाड़ - Page 315

294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मानपत्र पढ़ कर सुनाए जाने के बाद जवाब में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने छोटा-सा भाषण किया। अपने भाषण में उन्होंने कहा-

अध्यक्ष महाराज, सदस्यों और नागरिक जनों,

आपने मुझे जो मानपत्र दिया है उसके लिए मैं आपको बहुत धन्यवाद देता हूं। मुझे मानपत्र अगर नहीं भी दिया जाता तब भी मैं आपके प्रति ऋणी रहता। मेरे सार्वजनिक कामों की शुरूआत महाड़ में हुई। इस तरह के कामों के लिए आवश्यक प्रेरणा, स्फूर्ति भी मुझे यहीं से प्राप्त हुई। इसी शहर से मुझे सहयोगी भी मिले हैं।

चौदह वर्ष पूर्व हमारे आंदोलन के कारण महाड़ में जो दंगा हुआ उसके कारण कुछ स्थानीय लोगों द्वारा हमारा विरोध होना सहज ही है। इस टंटे के लिए कारण बने हम लोगों को साथ आज आप आदारपूर्वक सम्मानपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं यह देखकर मुझे बड़ी खुशी हो रही है। महाड़ के सहयोगियों का मेरे काम में बहुमूल्य मदद मिलती ही रहती है। इसलिए भी मुझे महाड़वासियों के बारे में गर्व महसूस होता है। ऊपरी तौर पर जातीय लगने वाला मेरा काम का असली स्वरूप राष्ट्रीय है यह आपने पहचाना। इससे आपकी सूक्ष्मबुद्धि का परिचय मिलता है।

वैसे आमतौर पर मेरा विषय राजनीति ही होता है यह आप जानते हैं। राजनीति के बारे में ना बोलूं तो मुझे कुछ छूट गया-सा लगता है। सात-आठ सालों तक मैं विदेशों में रहा हूं। विदेशों में ही हिंदुस्तान के विभिन्न प्रांतों के लोगों से इक्ट्ठे मिला जा सकता है, उनसे मित्रता की जा सकती है। विलायत में यह तभी महाराष्ट्रीय तथा अन्य प्रांतों के लोगों के स्वाभाव विषयक गुण-दोषों के बारे में जांचने का मौका मिला। बंगाल और मद्रास प्रांतों के लोगों की तुलना में महाराष्ट्रीय लोग बुद्धि में थोड़े उन्नीस हो भी सकते हैं शायद लेकिन महाराष्ट्रियों में जो व्यवहार कुशलता (Common Sense) कूट-कूट कर भरी होती है वैसी अन्यों में दिखाई नहीं देती।

विलायत में था तब हम हिंदी छात्र हर रविवार के दिन एक होस्टल में लेक्चर सुनने के लिए इक्ट्ठा हुआ करते थे। वहां मैंने एक विचित्र बात देखी। हम महाराष्ट्रीय छात्रों की संख्या कम थी। हम सात-आठ छात्र ही थे। एक तरफ बैठकर हम व्याख्यान सुना करते थे। भाषण के बाद बोलने वाले से प्रश्न पूछे जा सकते थे। और वक्ता द्वारा दिए गए जवाबों से प्रश्न पूछने वालों की हंसाई भी हुआ करती थी। चार-पांच सालों के समय में किसी भी महाराष्ट्रीय छात्र द्वारा सवाल पूछ कर अपनी हंसी उड़वाई हो, मुझे याद नहीं आता।

महाराष्ट्रीयों की इस नीति से क्या उनकी व्यवहार-कुशलता का परिचय नहीं मिलता?

एक और बात ध्यान में रखना जरूरी है। हिंदी आंदोलनों के बारे में पता करने के