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* आंदोलन का प्रभावी साधन हैं अखबार
सोमवार 26 अगस्त, 1940 की रात पोयबावाड़ी, परेल, मुंबई के समाज सेवा संघ के दामोदर हॉल में मुंबई म्युनिसिपालिटी में काम करने वाले अस्पृश्य कामगार इक्ट्ठा हुए थे। हॉल खचाखच भर गया था। ठीक 9 बजे अस्पृश्यों के कर्णधार डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर सभास्थल पर हाजिर हुए। श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत किया।
सभा की शुरूआत म्युनिसिपल कामगार संघ के चिटनवीस भाई प्रधान का भाषण हुआ। उनके बाद डॉ. बाबासाहेब का भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में कहा-
बहनों और भाइयों,
संघ के कारण भले आज आप यहां इक्ट्ठा हुए हों लेकिन आज मैं आपको संघ के बारे में कुछ बताने वाला नहीं हूं। आज मैं आपको एक बेहद महत्वपूर्ण बात बताने वाला हूं। उसे सुनने और सफलतापूर्वक उसे अमल में लाने के लिए आज आपको यहां बुलाया गया है। अपने पूरे आंदोलन का सार अपने अखबार में है और ये अखबार पिदले 20-22 सालों से किसी न किसी रूप में आपके सामने आता रहा है। पहले ‘मूकनायक’ फिर ‘बहिष्कृत भारत’ और आज ‘जनता’ उसके विभिन्न रूप हैं। ‘जनता’ को जन्म देता है ‘भारत भूषण’ छापा खाना बिल्ली के पिल्लों की तरह इन दो संस्थाओं को मैंने पाला है। बिल्ली को अपने पिल्लों की रक्षा करने के लिए एक जगह से दूसरी जगह उखाड़ना-बसाना पड़ता है उसी प्रकार ‘जनता’ तथा ‘छापाखाने’ को मुझे कई संकटों से उबारना पड़ा है। हमेशा के लिए ऐसे हालात हों तो नहीं चलेगा।
आज ‘जनता’ और छापखाने पर एक बार फिर संकट मंडरा रहा है। जिस जगह ये हैं उसे खाली करने का नोटिस लगा है। इसीलिए जनता और छापखाने को अब दूसरी जगह स्थानांतरित करना होगा। अबके बाद कम से कम जहां इन्हें ले जाया जाएगा वह अस्थायी जगह नहीं होनी चाहिए। इसीलिए अपनी जगह बनाना बेहद जरूरी हो गया है। यह बात सही है कि आप अकेले इस समस्या को हल नहीं कर सकते। आपकी ही तरह अन्यों पर भी यह बोझ आने वाला है। औरों से भी अपनी सही जिम्मेदारी लेने की विनती की ही जाएगी। आपसे पहले कहा जा रहा है क्योंकि आप संगठित
* जनताः 31 अगस्त, 1940