181 1.11.1940 ...तो गांवों के अन्याय पीड़ित लोगों की मदद की जा सकती है - दादर (मुंबई) - Page 326

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प्रिय भाइयो, इस प्रकार हर साल अगर 2500 रुपयों की पूंजी इक्ट्ठा हुई तो गांवों में अस्पृश्यों पर अन्य लोगों द्वारा जो अत्याचार किए जाते हैं, उन पीडि़तों की मदद की जा सकती है। इस प्रकार गांव के अस्पृश्यों को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए किसी के आगे झोली फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इस प्रकार तीन मंजिला इमारत और जगह की कीमत का कुल खर्चा एक लाख रुपए होगा। युद्ध के कारण सीमेंट और लोहे की चीजें महंगी हो गई हैं। दूसरी बात, इस फंड के लिए किसी और जाति से मदद मिलना संभव नहीं है। धार्मिक लोग अपनी जाति को ही दान देते हैं। हममें अमीर लोग भी नहीं हैं, हम काँग्रेस वाले नहीं हैं।

यह फंड हमें अपने ही लोगों द्वारा इक्ट्ठा करना होगा।

अमीरों की तरह अपने लोगों से एकदम 200, 500 या 1000 रु. की भेंट मिलना मुश्किल है। हममें से हर व्यक्ति को दो-दो रुपए देने होंगे और इसी प्रकार यह रकम जुटाई जानी चाहिए। जगह-जगह फंड कमेटियां बनाइए। अपना काम शुरू कीजिए। पैसा लेने के लिए मुझे ही आपके पास आना होगा यह अगर आपकी इच्छा हो तो मैं आऊंगा। लेकिन आप जानते हैं कि अपने समाज की जिम्मेदारी हर तरह से मुझ पर ही है। इसके बावजूद अगर आपका प्रेम इतना पागल हो तो मैं जरूर आऊंगा। लेकिन इमारत फंड के काम के बारे में कोई कोताही ना करें। इतना कहकर मैं अपना भाषण पूरा करता हूं।