182 23.11.1940 सार्वजनिक कामों के लिए एका जरूरी - वरली (मुंबई) - Page 327

306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* सार्वजनिक कामों के लिए एका जरूरी

23 नवम्बर, 1940 की रात 9 बजे बी.डी.डी. चॉल नं. 96, वरली, मुंबई के श्री शंकर नाथा खैरमोड़े की नई व्यायामशाला और डॉ. अम्बेडकर स्पोर्टिंग क्लब का सार्वजनिक उत्सव ताम-झाम के साथ मनाया गया। समारोह का अध्यक्ष स्थान स्वीकारना डॉ. अम्बेडकर ने माना था। वे जब सभा-स्थान पहुंचे तब ‘अम्बेडकर जिंदाबाद’, ‘अम्बेडकर की जय हो’, ‘थोड़े दिन में भीमराज’ जैसे नारों से वातावरण गूंज उठा। बाबसाहेब के मंडप में आते ही तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत किया गया। उनके साथ श्री डी. वी. प्रधान, श्री एम. ए. उपशाम, श्री पी.एल. लोखंडे, श्री वी. एल. कोलशीकर, श्री बी. एस. गायकवाड़ आदि कार्यकर्त्ता उपस्थित थे।

सभामंडप बेहतरीन ढंग से सजाया गया था। सभा में करीब दस हजार लोग उपस्थित थे। श्री झाल्टे ने अध्यक्ष पद की सूचना रखी। श्री आर. बी. पगारे द्वारा उनकी सूचना का समर्थन किया गया। उसके बाद श्री आर. एस. भालेराव का भाषण हुआ। उनके बाद डॉ. बाबासाहेब का भाषण हुआ। उन्होंने कहा-

प्रिय बहनों और भाइयों-

आज की सभा का निश्चित समय लोगों को पता नहीं था इसलिए लंबे समय तक भाषण देकर लोगों को भूखा रखने का मेरा इरादा नहीं है। मैं जिस काम के लिए आया हूं उसके बारे में संक्षेप में जानकारी देता हूं।

अपने समाज की भविष्यकालीन तस्वीर नजर के सामने झलकती रहने के कारण ही मैंने इमारत फंड के मसले पर काम करना शुरू किया है। अपनी जिंदगी में जितना करना संभव था उतना मैंने किया है। 1919 में सार्वजनिक आंदोलन शुरू हुआ तब अस्पृश्य समाज में जरा भी जागृति नहीं थी। हम भी इंसान हैं इसका अहसास तक नहीं था। ब्राह्मण, मराठे, पाटील आदि अस्पृश्य लोग जूते जैसा व्यवहार हमारे साथ किया करते थे। सांप कहते ही सब लोग डरते हैं। उसी तरह पाटील (चौधरी) पटवारी, कुलकर्णी आदि से अस्पृश्य समाज डरता था। शुरू-शुरू में हमारे लोगों को म्युनिसिपालिटी, लोकल बोर्ड, काउंसिल आदि में प्रवेश मिलना मुश्किल हुआ करता था। आज हमारे लोग कंधे से कंधा भिड़ा कर गर्व के साथ अपने हित के लिए संघर्षरत हैं। (तालियां) हममें से

* जनताः 30 नवम्बर, 1940