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कोई शिक्षामंत्री या गृहमंत्री भी हो सकता था लेकिन अब तक ऐसा मौका नहीं आया है। जहां पट्टेदार की जगह मिलना भी मुश्किल था वहां हममें से लोग डिप्टी कलक्टर तक बन रहे हैं। जिसने शून्य देखा उसी को सौ देखने का मौका मिले तो जाहिर है कि उसे गर्व और खुशी महसूस होगी।
इस तरह, हमने अपने आंदोलन में काफी दूरी तय की है। इसके बावजूद कहना पड़ेगा कि हमें अभी और बहुत काम करना है। इस कार्य के होने की राह में दो बड़े शत्रु हैं- गांधी और कांग्रेस। हाल ही में लिए गए साक्षात्कार के दौरान वाइसराय द्वारा जब गांधी से पूछा गया कि आप स्वराज तो चाहते हैं लेकिन आप राजाओं, रजवाड़ों, मुसलमानों और अस्पृश्यों के मसलों का क्या करें?’’ गांधी अपने पत्रक में कहते हैं, ‘‘राजाओं रजवाड़ों कें साथ हम सुलह करेंगे लेकिन अस्पृश्यों के बारे में पूछने वाले आप कौन होते हैं? अस्पृश्यों का हम जो चाहे करेंगे।’’ राजों-रजवाड़ों के साथ सुलह करने के लिए वे तैयार हैं लेकिन सरकार जब अस्पृश्यों के बारे में सवाल करती है तब गुस्से से गांधी तिलमिला उठते हैं। अस्पृश्य समाज की उन्नति की राह का यह बड़ा अड़ंगा है। इस अड़ंगे को मैं अपने जीते जी अगर हटा पाया तो आपका भविश्य सुखकर होना तय है। (तालियों की गूंज)
मुझे एक और चिंता है कि आज तक हमने जो एकजुट और उन्नति हासिल की है उसे आप बरकरार कैसे रखेंगे? आज तक आप एक खंभे वाले तूंबू में आराम से रहते आए हैं। उस तंबू का खंभा अगर गिर जाए तो आपका क्या हाल होगा? इसीलिए उस
खंभे के आसपास और खंभे रस्सियों के सहारे खड़े कर उसे मजबूत बनाने की मैने सोची है। इसीलिए इमारत फंड शुरू किया है। इसके पीछे उद्देश्य यही है कि मेरे पीछे आपको कोई मात ना दे सके। साथ ही आप बेहतर ढंग से सार्वजनिक काम कर पाएं। आज भी आपके सामने हजारों अड़चनें हैं। धन के अभाव में उनके बारे में कुछ किया नहीं जा सका है। इमारत फंड की आय से जो रकम जुटेगी उसका इस्तेमाल आपकी शिकायतें दूर करने में किया जाएगा।
हमारे समाज में अधिक पढ़ा-लिखा हूं इसलिए मैं सरकार से अधिकारी के पद की मांग कर सकता था। मैं अधिकारी बन भी जाता। फिर मेरे अज्ञानी भाइयों का क्या होता? अस्पृश्य समाज के लिए मैं अपने स्वार्थ को भुला कर और अपने परिवार के सुखों पर नजरें गड़ाए बगैर यह कार्य कर रहा हूं। इसीलिए, जो जितना काम कर सकता है वह उतना काम करे। इमारत फंड के लिए जितनी मदद आप दे सकते हैं उतनी आप अवश्य दें। इंसान पर तीन ऋण होते हैं। माता-पिता का, कुल देवता का, समाज का। जिस समाज में हमारा जन्म हुआ है उस समाज के उपकारों से हमें बिना भूले मुक्त होना चाहिए। और इस उपकार को चुकाने का मौका आपको मिल रहा है। आप जरूर