310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की सारी जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी। मैंने उसे अपना कर्तव्य मान कर स्वीकारा था। हो सकता है कई लोगों को मेरा काम नापसंद हो। इसलिए वे मेरी आलोचना भी करते हैं। सामाजिक, राजनीतिक कार्य करनेवालों की आलोचना होती ही है। मैं खुद भी हर हफते ‘जनता’ में गांधी की आलोचना करता ही हूं। जाहिर है कि मेरी आलोचना करने का अधिकार भी लोगों को है। हालांकि मैं मानता हूं कि आलोचना करते वक्त आलोचक का मन साफ होना जरूरी है। किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर, या मन में किसी तरह की गांठ रख कर किसी की आलोचना नहीं की जानी चाहिए। मुझे सार्वजनिक कार्य में उपलब्ध साधनों के बारे में और गांधी को उपलब्ध साधनों के बारे में तारतम्य के साथ सोचना चाहिए। 20 वर्ष पूर्व हम सबकी हालत कैसी थी? अब कैसी है? इन सभी बातों के बारे में सोचो तो मेरे नाम पर कभी शून्य नहीं आएगा।
मेरे साथ काम करने वाले अन्य पक्ष भी हिन्दुस्तान में है। ब्राह्मणेतर पक्ष 1850 ईसवी से काम कर रहा है। मराठा राजा भी उनको दो-दो पैसों से मदद कर रहे हैं। उनके अखबार ‘विजय मराठा’ की उन्होंने रु. 30,000 से भी अधिक रकम देकर आर्थिक मदद की है। लेकिन मेरी केवल ढाई हजार रुपए देकर मदद की है। उसमें बीस सालों तक मैंने यह अपनी दुनिया चलाई है। लेकिन आखिर ब्राह्मणेतर पार्टी का क्या हुआ? आज वाइसराय मुंबई आते हैं तो सैकड़ों लोगों से मिलते हैं। लेकिन उनमें हमारे भास्कर राव जाधव का कहीं अता-पता नहीं। ‘जो हो।’
बीस वर्ष पूर्व मैंने सार्वजनिक काम के पेड़ का बीज बोया था। अब उसमें कोंपलें आई हैं। आगे उनमें फल आएंगे। ऐसा लगता है। जितनी उन्नतियां हुई हैं वह कायम कैसे रहेंगी इसका प्रबंध मुझे करना होगा। अब तक का काम सूख गया, फलविहीन हुआ ऐसा कोई कह न पाए इसका मुझे प्रबंध करना होगा। फिर भी अगर कोई ऐसा कहे तो वह मेरा दुश्मन ही होगा। मैं सच कह रहा हूं। इस काम की बुनियाद भी विशुद्ध, निर्मल है। हमें ऐसा प्रबंध करना होगा ताकि हमें किसी के आगे हाथ ना फैलाना पड़े।
कई लोग काँग्रेस में शामिल होते हैं। काँग्रेस के लोग उनके हाथ में चक्की थमाएंगे लेकिन मुझे यकीन है कि वे मेरे हाथ में बंदा रुपया थमाएंगे। (तालियां)
मुंबई काँग्रेस के एक बड़े नेता श्री भुलाभाई देसाई मुझसे कहते हैं, ‘‘आप सेवाग्राम चल कर गांधी जी से बात कीजिए।’’ लेकिन मुझसे यह नहीं होगा।
बचपन में मैंने पुराण पढ़ा था। उसमें कहा गया है कि दूसरे का अनाज खाने वाला कभी आजाद नहीं हो पाएगा। भीष्म, द्रोण आदि वरिष्ठ लोगों को पता था कि कौरवों का पक्ष झूठ का पक्ष है। राजगद्दी पर पांडवों का ही अधिकार था। वे यह भी जानते थे कि जीत पांडवों की ही होनी है। इसके बावजूद के कौरवों की तरफ से लड़े। किसी ने उनसे पूछा, आपने ऐसा क्यों किया? भीष्म ने कहा, ‘‘हम उनका अनाज (भात) खाते हैं, इसलिए!