183 24.11.1940 अभी कोंपलें निकली हैं, यह संकेत है कि पफल आएंगे - चिखलपाडा (मुंबई) - Page 332

311

हमें आजादी हिंदू लोगों के पीछे पड़ कर नहीं मिलेगी। उनका वांगूलचालन करना ही काफी नहीं होगा। हमारे बाप-दादों ने यह सब आजमाया। उन्होंने उनके सामने-यानी हिंदुओं के सामने कभी सिर पर छाता नहीं पकड़ा, पैरों में जूते-चप्पलें नहीं पहने, कई बातें कीं। लेकिन उससे हासिल क्या हुआ? असल में उनके साथ संग्राम करना होगा, झगड़ना होगा। उसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। (तालियां)

मैं उनका भात (अनाज) नहीं खाना चाहता। मैं खुद समाज का उद्धार करना चाहता हूं। कोई गरीब आदमी अपनी गुदड़ी में थेगलियां लगाकर किसी तरह अपना बदन ढांकता है। उसी तरह मैं आज तक समाज कार्य करता आया हूं। असल में यह बताना जरूरी है कि भीख मांगकर आजादी नहीं मिलेगी। मेरा मन मुझे बताता है कि इन बीस वर्षों में मुझसे कोई गलती नहीं हुई है। कोई भी साबित कर बताए कि मेरे कार्य से समाज का फलां-फलां नुकसान हुआ है। आज तक का मेरा काम निराशाजनक बिल्कुल नहीं है। आत्मबल के सहारे ही सब कुछ करना है। हमें पैसों की आवश्यकता है। राजनीति बिना पैसों के नहीं चलती। आदमी की गृहस्थी के लिए पैसों की जरूरत होती है। राजनीति बिना पैसे के चलेगी नहीं। इसी प्रकार सामाजिक गृहस्थी के लिए भी पैसों की इससे भी अधिक जरूरत होती है। हमारे पास पैसा नहीं है। काँग्रेस के पास धन की थैलियां हैं। उनके राजनीतिक कामों के लिए अगर रुपए भर कर खर्चा आता हो तो हमें कम से कम चवन्नी तो लगेगी ही। महाड़ और नासिक के सत्याग्रह हमने भीख मांगकर ही किए हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा? घड़े में छेद होने के कारण पानी उसमें से बह जाएगा यह तो जाहिर ही है। इसलिए, मेरी राय में इस मामले में कोई स्थायी प्रबंध होना जरूरी है। इमारत बनाने के लिए अंदाजन दो-ढाई लाख रुपयों का खर्च आएगा। इसी इमारत से आगे सालाना पांच हजार रुपयों का किराया मिला तो अपनी हालत में सुधार होगा। हम सभी लोगों को तन-मन-धन लगाकर इस कार्य में जुट जाना होगा। कोई कहेगा, डॉक्टरसाहब बेकारों से भी पैसा मांगते हैं। लेकिन मैं यह पूछना चाहूंगा कि क्या व्यक्ति जिंदगी भर बेकार रह सकता है? महीने-दो महीनों तक कोई बेकार रह सकता है। खूंटियां गाड़ कर उनमें रस्सियां बांध कर इस तंबू को मजबूती देनी होगी। ऐसा अगर नहीं किया गया तो ऊंची उड़ी पतंग जिस तरह कन्नी कटने पर नीचे आ गिरती है उसी तरह आपकी गत होगी। ऐसा नहीं होना चाहिए। मेरे बाद भी मंजिल तक पहुंचने के लिए आपको लंबी दूरी तय करनी है। आपकी राह सुखमय हो, उस राह पर आपकी यात्रा सुखकारी हो इसलिए मेरी ये सारी कोशिशें हैं। इसलिए, भाइयों और बहनों, दम लगा कर इस काम की शुरूआत करो। इसी सूचना के साथ मैं अपना भाषण पूरा करता हूं।

आखिर में श्री मडकेबुवा ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को फूलमाला पहनाई और श्री सालवे मास्तर द्वारा धन्यवाद अर्पण कर फूलों की माला अर्पण करने के बाद डॉ. बाबासाहेब के जयकार के साथ सभा संपन्न हुई।