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लगे। जिन्होंने यह कहा उनके नाम यहां बताने की जरूरत नहीं है। मेरी ही तरह आपको भी उनके नाम पता होंगे ही। उन लोगों में से किसी ने सार्वजनिक आंदोलनों में हिस्सा लिया है ऐसा मेरी मनोदेवता मुझे नहीं बता रही। ऐसी ही लोगों ने खुले आम कोकणस्थ और देशस्थ का विवाद खड़ा किया है। इस भेदभाव के कारण समाज का कल्याण होना तो दूर की बात, नुकसान तुरंत हो जाएगा। यह भेदभाव निर्माण करने वालों ने इधर दस-बारह सालों में कुछ सामाजिक हित का काम किया होता तो मुझे खुशी ही होती। कुछ बोर्डिंग ही खोल लेते, कुछ गरीब छात्रों को वजीफे दिलवाते, तब भी मुझे बड़ी
खुशी होती। लेकिन ऐसे समाजोपयोगी कोई काम किए बगैर वे बस भेद नीति निर्माण कर रहे हैं। मुझे बेहद कटु शब्दों में बताना पड़ रहा है। यहां इक्ट्ठा हुए लोगों को एक शुभ संदेश देने को मेरा मन कर रहा है। वह यह कि आप देशस्थ, कोकणस्थ, कर्नाटकी या वायदेशी जैसा भेदभाव करेंगे तो आपका अश्वःपतन हुए बगैर नहीं रहेगा। इतने समय तक हमारी अधोगति हुई उसे अब और नहीं होने देना चाहिए। समाज में भेदभाव फैलाने वालों को आप बिल्कुल आसरा ना दें। इसके लिए मुझे कड़े उपाय बनाने पड़ेंगे। यह पहचान कर ही शायद आप लोगों ने आपसी मतभेदों को भुलाकर इस अपूर्व सभा का आयोजन किया। इसीलिए आपके प्रति आभार प्रकट करना योग्य ही है, जो हो!
भाइयों, इमारत के बारे में मुझसे पहले बोले दो वक्ताओं ने आपको जानकारी दी है। इससे पूर्व मैंने भी इमारत के बारे में दो-तीन जगह भाषण दे चुका हूं। आप अगर ‘जनता’ पढ़ते हों तो आपको भी इस बात का पता चला हो। मुझसे पहले बोलने वाले वक्ताओं ने जो बताया उससे लगता नहीं कि उन्होंने मेरी मंशा को जाना है।
इमारत के बारे में पता होना जरूरी है। यह इमारत देश की तरफ चौपाल बनती है वैसे नहीं बनानी है। देश की तरफ (सह्यद्री के पूर्व का इलाका) वाली चौपाल में काम-धंधा न करने वाले बेकार महार लोग लोट लगाते रहते हैं। ऐसी इमारत बनाने का मेरा इरादा नहीं है। मुंबई में दगड़ चॉल में एक भगवान शिव का एक मंदिर था। वहां कई साधु चरस, गांजा आदि पीकर मठ में गप्पें हांकते हुए बैठे रहते थे। वहां हिंदू-मुसलमान दोनों रहा करते थे। वे सब एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते-पहचानते थे। एक दिन किसी ने मंदिर की शंकर की पिंडी फोड़ दी। तब मुसलमानों पर शक जाना स्वाभाविक था। लेकिन पूछताछ में पता चला कि मूर्ति मंदिर में बैठने वाले साधुओं ने तोड़ी थी। मुसलमानों ने नहीं तोड़ी थी। भाइयों, मैं जो इमारत बनाना चाहता हूं वह बेकार महारों के दिन-रात सोने के लिए नहीं होगी। इमारत के बनाने के बारे में अलग उद्देश्य है।
उस उद्देश्य को अगर जानना हो तो एक और विषय के बारे में जानकारी लेना आवश्यक है। हम अस्पृश्य दरिद्रता के गरक में फंसे हैं। हमारे पास पैसा नहीं है। मेहनत