314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किए बगैर हमें रोटी नहीं मिलती। लेकिन हमारे पास संगठन का बड़ा बल है। उसी के सहारे हमें प्रति पक्ष से मुकाबला करना है।
हमें जो भी राजनीतिक अधिकार मिले हैं उन्हें हमसे छीनने के लिए कांग्रेस भी तैयार है। कांग्रेस ने बड़े-बड़े लोगों को बलहीन बना दिया है, हरा दिया है। किसी जमाने में गैर-ब्राह्मण पक्ष बलाद्य था। उनका सत्य शोधक समाज काफी तेजी से काम कर रहा था। गणपति महोत्सव के समय ब्राह्मणों का गणपति अलग और मराठों का गणपति अलग होता था। उस वक्त मराठों ने ब्राह्मणों को चिढ़ाने के लिए एक शब्द प्रयोग भी बनाया था। ब्राह्मणों को वे ‘हर्रर्र बे’ कहा करते थे। लेकिन जो गैर-ब्राह्मण ब्राह्मणों को गालियां देते थे उनका आज क्या हाल है? रा. ब. बोले ने अपनी पूरी जिंदगी ब्राह्मणों को गालियां देने में बिताई। लेकिन आज वही बोले बैरिस्टर सावरकर की हर बात झेलने के लिए तैयार खड़े होते हैं। वही बात पुणे के जेधे की भी है। अब वे पुणे के एक ब्राह्मण के हाथ का खिलौना बन गए हैं।
गैर-ब्राह्मणों का पक्ष जब इतना बलवान था तो फिर वह काँग्रेस के आगे क्यों लोट लगा रहा है? इसका कारण एक ही है। क्योंकि उनमें एका नहीं है। सब बिखरे हुए हैं। हमारा हाल उनके जैसा नहीं है। हमें जो भी मिला है उसका हम अपनी जाति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। और वह भी बिना किसी के गुलाम बने।
आजकल की राजनीति मुफत में नहीं की जा सकती। काँग्रेस की राजनीति खेलने के लिए गांधी ने एक करोड़ रुपए खर्च किए हैं। पिछले इलेक्शन में मुझे हटाने के लिए काँग्रेस ने एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया था। कोई भी और अगर चुनाव जीतता तो उन्हें पता चल जाता लेकिन मुझे वे जीतने नहीं देना चाहते थे। इसीलिए सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस काम पर 35000 रुपए खर्च किए। लेकिन हमारे समाज की एकता के कारण मैं दूसरे स्थान पर चुनाव जीता। पारसी महिलाएं अगर अपने वोट डॉक्टर गिल्डर को नहीं देतीं तो मैं पहले नंबर से चुनाव जीत जाता। इसीलिए, समय-समय पर होने वाले चुनाव जीतने के लिए पैसा न होने के कारण हमारी हालत पतली होने की संभावना है। वैसा न हो इसलिए हमें यह इमारत बनानी है। इस इमारत से हमें हर साल 5-6 हजार रुपयों का किराया मिल सकता है। इसी प्रकार गांव-गांव में हमारे लोगों को स्पृश्य लोगों से परेशानियां झेलनी पड़ती रहती हैं। कई लोग मुझसे अपने अनुभव बताते रहते हैं। लेकिन मैं क्या कर सकता हूं? कुछ करना हो तो पैसों की आवश्यकता होती है। वकील लोग पैसों के बगैर कैसे काम करेंगे? इसीलिए मुझे लोगों को बड़ी मिन्नतों से समझाना पड़ता है कि मैं आपके लिए ज्यादा कुछ कर नहीं पाऊंगा। यह बात कहते हुए मुझे बड़ी तकलीफ होती है। यह बड़े शर्म की बात है। इसीलिए इस इमारत से होने वाली आय से हम अपने लोगों के दुख कुछ हद तक ही सही कम तो कर ही सकते हैं।