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इस इमारत फंड में पैसा देने के लिए हमारे पास अमीर लोग नहीं हैं। इसीलिए जिस प्रकार बूंद-बूंद से हौज भरता है उसी प्रकार सबको थोड़े-थोड़े पैसे देकर इस इमारत फंड को पूरा करना होगा।
यह मेरे या किसी ओर के स्वार्थ का मामला नहीं है। यह इमारत यानी सभी लोगों की पूंजी है। यही आस्था मन में पालते हुए हमें मदद करनी होगी। जिन लोगों की तनख्वाह 25 रुपयों तक है उनके लिए मैंने दो रुपए चंदा तय किया है। जिनकी तनख्वाह इससे अधिक है वे सींग तुड़ा कर बछड़ों में शामिल होने वाली गाय की तरह ना बनें। वे सब अपनी एक महीने की तनख्वाह किश्तों में इस काम के लिए दें। जिंदगी भर पैसा कमा कर आप अपने रिश्तेदारों को पालेंगे, साहूकार का कर्जा चुकाएंगे, गहने बनवाएंगे, लेकिन इस सामाजिक ऋण को भी आपको चुकाना है। इस काम में आप आगा-पीछा न सोचें या जी चुराने की कोशिश न करें। मैं आपसे सीधे शब्दों में विनती करता हूं। उससे अगर कुछ फायदा नहीं हुआ तो कड़े उपाय भी करने से मैं हिचकिचाऊंगा नहीं। वह उपाय क्या होगा? वह होगा जाति से बहिष्कार। बुरा काम करने वाले को हम जिस प्रकार बहिष्कृत करते हैं उसी प्रकार इस कार्य में मदद नहीं देने वाले को भी बहिष्कृत करना गलत होगा ऐसा मुझे नहीं लगता। इतना कह कर तथा आप सब इस काम में मदद दें यह एक बार फिर कहकर मैं अपना भाषण पूरा करता हूं।