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तब स्पृश्य लोगों ने उन्हें पीटा। उस वक्त मैं डाक बंगले में या तो लोगों ने मेरा घेराव किया। हालांकि वहां पुलिस थी इसलिए वे मुझे कुछ कर नहीं पाए।
जब सत्याग्रह के लिए आए लोग अपने-अपने गांव लौटे तब कई गांवों के स्पृश्य लोगों ने हमारे पुरुषों के साथ पारपीट की, हमारी महिलाओं के साथ भी मारपीट करने से वे चुके नहीं। इतना ही नहीं, कई स्पृश्य लोगों ने हमारे लोगों द्वारा बुआई की गई जमीनें छीनी। और भी कई तरीकों से परेशान किया। कुलाबा जिले के हमारे लोगों ने एक-दो सालों तक ये परेशानियां झेली। दुख की बात यह थी कि हम मुंबई में रहने वाले लोग उनके लिए कुछ नहीं कर पाए। इसकी वजह क्या थी? और कोई नहीं बल्कि इसकी यही वजह थी कि उनके दुखों को हरने के लिए हमारे पास पैसा नहीं था। इसी कारण मेरे मन पर ऐसा असर हुआ है कि मुझे लगता है कि सामाजिक लड़ाई लड़ने के लिए हमारे पास पैसा होना जरूरी है। इस इमारत से हमें कुछ पैसा मिलेगा।
अब तक हमारे कई सामाजिक काम हो चुके हैं और हो रहे हैं। लेकिन मैं जब तक जिंदा हूं तब तक यह ठीक है। मेरे बाद क्या होगा? हममें अभी तक जितना सुधार होना चाहिए उतना नहीं हुआ है। आगे हमें अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी। इसलिए इस इमारत के पूरा हो जाने पर मेरे बाद के लोगों के लिए वह सुविधाजनक रहेगा। उनके लिए अगर मैंने कोई योजना बना कर नहीं दी तो वे मुझे दोष देंगे।
यह इमारत जब बनी जाएगी तब मेरे अंदाजे के अनुसार सालाना उससे हमें पांच-छह हजार रुपयों की आमदनी होगी। इस रकम का प्रयोग हमारे लोगों को स्पृश्य लोगों से दी जाने वाली तकलीफ का निवारण करने में होगी।
जिस प्रकार कोई सेठ अपने बेटे के लिए इमारत या कोई चॉल बना कर रखता है उसी प्रकार मेरा उद्देश्य इस इमारत को बनाने के पीछे है। मेरे बाद आपको इस इमारत से बहुत मदद मिलेगी। हालांकि आप सभी को आपस में एका तो रखना ही होगा। इसीलिए आप सभी को इस काम में मेरी मदद करनी होगी।
इस अवसर पर तीन बातें आपको बताने की मेरी इच्छा है। पहली बात यह कि आप जिस कचरापट्टी का काम करते हैं वह सम्मान का काम नहीं है। यह बेहद गलीज काम है। हमारे लोग पहले पलटन में थे। आजकल नहीं हैं इसकी वजह क्या है? वजह यही है कि हमारे लोगों का यही व्यवसाय है। अंग्रेज सरकार को लोगों की बेहद जरूरत होने के बावजूद हमें पलटन में, सेना में नहीं लिया जाता सेना में स्पृश्य लोगों की संख्या अधिक होने से अंग्रेज सरकार हमसे अधिक उनकी फिक्र कर रही है। इसीलिए कहता हूं कि आपके बाद आपके बच्चों को आपका काम न करना पड़े इस बात का एहतियात आप सभी को बरतना होगा। बच्चों को पढ़ाना होगा। अपने बच्चे अध्यापक, क्लर्क बनें