186 23.2.1941 मैं पूछता हूं अस्पृश्य गवर्नर क्यों नहीं हो हो सकता? - तडवले (ढोकी) - Page 340

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* मैं पूछता हूं अस्पृश्य गवर्नर क्यों नहीं हो सकता?

23 फरवरी, 1941 को तडवले (ढोकी) में आयोजित सोलापुर जिला और मुगलई मराठवाड़ा विभाग की महार-मांग ईमानदार परिषद के लिए अखिल भारतीय अस्पृश्यों के नेता वंदनीय डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर दिनांक 02 फरवरी, 1941 की सुबह तडवले स्टेशन पहुंचे। बार्शी के आगे हर स्टेशन पर अस्पृश्य समाज की ओर से उनका सत्कार होने के कारण आज गाड़ी तडवले में आधा घंटा देर से पहुंची थी। वहां से फूल-पत्तियों से सजी 50 बैल जुती गाड़ी में उनका लता-पल्लवों से सजे रास्ते पर जुलूस निकला। सींगी, डफली, नगाड़े, तुरही, शहनाई, बैंड, बाजा, आदि के साथ तबले, येडशी, उस्मानाबाद आदि जगहों के आत्मयज्ञ दल के सैंकड़ों सैनिक और हजारों अस्पृश्यों के मुख से निकलने वाले ‘अम्बेडकर कौन है, दलितों का राजा है’ जैसी जयकार ध्वनि से तडवले का वातावरण गूंज उठा था। इसी प्रकार हंसी-खुशी जुलूस परिषद के शामियाने तक आते ही सैकड़ों महिलाओं ने बाबासाहेब के आगे घड़ों से पानी उंडेल कर सड़क बुहारी, नारियल से उनकी नजर उतारी, उन्हें असीसते हुए उनकी आरती उतारी। कई महिलाओं ने ‘हमारी ये छोटी-सी भेंट इमारत फंड के लिए लीजिए’, कहते हुए कुछ पैसे भी दिए! सैकड़ों फूलमालाएं उन्हें अर्पण की गईं। तब आराम करने के लिए वे अपने निवास-स्थान चले गए। शाम के समय कमेटी और अन्य विषयों पर चर्चा हुई। दूसरे दिन यानी 23 फरवरी, 1941 की सुबह 9.45 को दस हजार श्रोताओं से भरे मंडप में ईशस्तवन के साथ परिषद के कामकाज की शुरूआत हुई। ए.एच. भालेराव ने अध्यक्ष की सूचना रखी। हरिभाऊ तोरणे ने सूचना का समर्थन किया। उसके बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा अध्यक्ष-स्थान स्वीकारे जाने के बाद परिषद के स्वागतध्यक्ष श्री देवीचंद मारूती कदम का भाषण हुआ। उनके बाद डॉ. बाबासाहेब बोले।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा-

भाइयों और बहनों,

आपमें से कोई निजाम की रियासत से आए हैं तो कोई खालिसा हिस्से से आया है। इसलिए आज मुझे अपने भाषण के दो हिस्से करने पड़ेंगे। एक खालिसा के भाइयों के लिए और दूसरा निजाम के प्रांत के भाइयों के लिए। सोलापुर जिले के भाइयों को

* जनताः 1 मार्च, 1941