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को अगर पानी पिलाना हो तो समता से पिलाइए। हम विषमता को खत्म करना चाहते हैं। ऐसे छोटे-मोटे उपायों से वह नष्ट नहीं होगी। शरीर के नाजुक हिस्से पर उगे फोड़े को ठीक करना हो तो तेल-पानी लगाकर, फिटकरी घुमाने से क्या काम चल जाएगा? हरिजन सेवक संघ, काँग्रेस और गांधी मुसलमानों की मनुहार करेंगे। राजाओं की मनुहार करेंगे लेकिन अस्पृश्यों के बारे में? बिल्कुल नहीं! गांधी को हिंदू गवर्नर चाहिए, हिंदू कलक्टर चाहिए। मैं पूछता हूं, अस्पृश्य गवर्नर क्यों नहीं चाहिए? अस्पृश्य कलक्टर क्यों ना हो? लेकिन गांधी बस यही तो नहीं चाहते। मध्यप्रांत में डॉ. खरे एक अस्पृश्य को दीवण का पद देते हैं तो तुरंत गांधी का पित्त खौलता है! वे डॉ. खरे पर भिन्नाए। सही समय आते ही मैं उनके बीच हुआ पत्राचार उघाड़ने वाला हूं, सार्वजनिक करनेवाला हूं। संक्षेप में बताना हो तो गांधी का आंदोलन, उनका सार्वजनिक परिवार अस्पृश्यों के संदर्भ में इसी तरह पक्षपातपूर्ण रहा है। परिवार चलाना हो तो नोन, मिर्च, लकड़ी की भी जरूरत होती है। गांधी के इस परिवार को सेठ-साहूकारों से यह सब मिलता रहता है। आज कांग्रेस का जो नाम हुआ है उसमें गांधी का कोई योगदान नहीं रहा है। वह एक करोड़ रुपए के फंड की करामत है! भाइयों, अपनी गृहस्थी हमें खुद ही चलानी होगी। लेकिन वह चलाने के लिए न हमारे पास कोई साधन नहीं है, पैसे नहीं हैं और फंड तक नहीं है। लेकिन यही सोच कर हताश होकर बैठेंगे तो इस आपाधापी में हम टिक नहीं सकते। हमें तो सम्मान से जीना है। और इस प्रकार जीना हो तो अपने हक की राजनीतिक सत्ता हमारे हाथ में होना जरूरी है। महार की का लोभ और कितने समय तक हम सीने से लगाकर रहेंगे? मैं भी आठ आने का वतनदार हूं। क्या फायदा? मैंने इसीलिए वतनदारी का लोभ त्याग दिया। आज भी मेरे घर की छत से टांग कर रखे हुई भगवानों की मूर्तियां स्पृश्य गांववाले शादी-ब्याह के समय बाजे-गाजे के साथ ले जाते हैं। एक बार इसमें रूकावट आई तो गांव में महामारी आई। अपने सार्वजनिक कार्य को इस प्रकार महामारी का शिकार होने से बचाइए। अपने आंदोलन के काम में रूकावट न आए, वह निरंतर चलता रहे इसलिए मैंने मुंबई में ढाई लाख रुपयों की एक इमारत बनाने का निर्णय लिया है। उस इमारत के कुछ हिस्से में ‘जनता’ पत्रिका का दफतर होगा, प्रेस होगा और अन्य हिस्सों को किराए पर चढ़ाया जा सकता है। सालाना आठ-नौ हजार रुपयों की आमदनी होगी। उसमें हमारा खर्चा चल जाएगा। इसके लिए देश के अस्पृश्यों से, हर घर से कम से कम एक रुपया जरूर लें। यह पैसा इक्ट्ठा करने के लिए मैंने इस जिले में केवल दो लोगों को चुना है। एक हैं विधायक ऐदाले और दूसरे हैं हरिभाऊ तोरणे। उन्हीं को आप पैसे दें। पैसा आपको खुद ही इक्ट्ठा करना होगा। औरों से पैसा लेंगे तो हमें उनकी मर्जी से चलना पड़ेगा, हम उनके हो जाएंगे। महाभारत के कौरव-पांडवों की कहानी आप जानते ही होंगे। न्याय पांडवों के साथ है, सत्य भी उनकी तरफ ही है इसका पूरा-पूरा अहसास होने के बावजूद भीष्म-द्रोण जैसे योद्धा कौरवों की