187 11.5.1941 कुत्ते की नहीं, इंसान की मानसिकता अपनाएं - परेल (मुंबई) - Page 346

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कार्यक्रम में इसके बाद सुप्रसिद्ध जलसाकर श्री भीमराव धोंडिब्बा कर्डक ने नासिक जिले की ओर से ‘जनता’’ पत्रिका के लिए कुल 113 रु. की थैली अर्पण की और भाषण किया।

उनके बाद श्री दगडूजी जाधव ने परेल गवर्नमेंट गेट, लाल चॉल की ओर से 80 रु. की पहली किश्त डॉ. बाबासाहेब को इमारत फंड के लिए दी। इसके बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने कहा-

‘‘विद्यार्थी और भाइयों और बहनों,

आज यहां आते समय मैं कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलना चाहता था लेकिन यहां बहुत कम लोग होने के कारण मैं उस उद्देश्य के बारे में आज आपको यहां कुछ बता नहीं पाऊंगा। आज तीन बस्तियों से यहां सामाज कार्य के लिए पैसे दिए गए हैं। इसके लिए मैं यहां के लोगों के प्रति कृतज्ञ हूं।

हमें पैसों की बेहद जरूरत है। इमारत फंड के अलावा कुछ अन्य प्रसंग भी हमारे सामने आ रहे हैं। रुपयों का संकट हमेशा बढ़ता जा रहा है। हमारे इंजीनियर का शुरूआत में अंदाजा था कि इमारत बनाने के लिए दो-ढाई लाख रुपए लगेंगे। अब सीमेंट, लोहा आदि समान महंगा होने के कारण दो-ढाई लाख की जगह 4 लाख रुपयों का खर्च आने का अंदाजा है।

चार लाख रुपयों की जिम्मेदारी कहां और आजकी हम सभा में मिली अल्प रकम का उससे क्या मूल? यह जिम्मेदारी केवल लोग नहीं निभा पाएंगे। इसके लिए अब मुझे कुछ अन्य उपाय करने पड़ेंगे। लेकिन एक बात से मुझे बड़ी खुशी मिली है। आजकल के लोगों में समाज कार्य को लेकर बेहद उत्कटता निर्माण हुई है। काम के प्रति आपका उत्साह देख कर मुझे बड़ा संतोष होता है। इसीलिए यहां के लोगों का मैं ऋणी हूं। मुझे ऐसा लगता है कि ऊंचे वर्ग की संस्थाएं जिन उपायों के तहत काम करती हैं उन्हीं को अमल में लाना बेहतर रहेगा। पुणे में ब्राह्मणों की सेवासदन संस्था को लीजिए। इस संस्था में लड़कियों को शिक्षा का लाभ मिलता है। आगे चलकर वे लड़कियां कुछ काम करती हैं। उत्सव, त्यौहार आदि प्रसंगों पर टिकट बेचकर वे काफी पैसा कमाती हैं। पहले मेरे पास भी ऐसे लोग आते थे लेकिन अब नहीं आते। हो सकता मेरी आजकल की नीति के कारण हो।

एक छात्र ने बताया कि हमारे लोग त्यौहार वगैरा मनाते नहीं। लोग भले होलिका दहन नहीं करते होंगे, गणपति नहीं लाते होंगे, चैत्र पतिपदा के यानी साल की शुरूआत के दिन दरवाजे पर बंदनवार नहीं लगाते होंगे लेकिन वे त्यौहार मनाते होंगे ऐसा मुझे लगता है। ऐसे प्रसंगों पर जो लोग सामाजिक कार्य के टिकट लेकर घर-घर जाएंगे तो