187 11.5.1941 कुत्ते की नहीं, इंसान की मानसिकता अपनाएं - परेल (मुंबई) - Page 347

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अच्छा ही होगा। यह महत्वपूर्ण बात है। शिक्षा पाना जरूरी है। आप सभी की ऐसी भावना हुई है कि महार यानी सरकारी भिखारी। आप मानते हैं कि रोटी मांगना आपका हक है लेकिन यह झूठ है। रोटी मांगना कुक्रे का जीवन है। भीख मांगने की आदत और मानसिकता को लोग त्याग दें। काँग्रेस ने सत्याग्रह का आंदोलन केवल अपना हक पाने के लिए शुरू की है। मैं अगर काँग्रेस में जाऊं तो इमारत के लिए 4 लाख रुपयों की जगह 10 लाख रुपये जोडूंगा। लेकिन यह कुत्ते की मानसिकता हुई, इंसान की नहीं। हमें इस मानसिकता का त्याग करना होगा। इंसानों की मानसिकता अपनानी होगी। हमने अपनी जिम्मेदारी पहचानी है इसका मुझे संतोष हैं।

दूसरी बात यह है मिक पिछले दो सालों से ‘जनता’ पत्रिका पर कई आपत्तियां आई हैं। ‘जनता’ पत्रिका की जिम्मेदारी की जड़ें बेहद महत्वपूर्ण हैं। आप ‘जनता’ लेते हैं। इस अंक का अग्रलेख-मुख्य संपादकीय मैंने कल रात 11 बजे लिख कर दिया और सुबह ‘जनता’ का अंक तैयार हुआ। ‘जनता’ के लिए जरूरी कागज की कीमत साढ़े नौ रुपयों से साढ़े दस रुपये हुई है। इतनी कीमत बढ़ जाए तो एक बार लगता है कि पत्रिका को बंद कर दिया जाए। लेकिन यह पत्रिका हमारे आंदोलन की आत्मा है। कहां क्या हुआ यह हमें इस पत्रिका के जरिए ही पता चलता है। इसीलिए कहता हूं कि जिस दिन ‘जनता’ पत्रिका बंद होगी उसी दिन आपका आंदोलन भी मटियामेट हो जाएगा। पिछले शनिवार को हमारी सभा हुई। सोचा गया कि क्या पत्रिका को बंद कर देना चाहिए? साप्ताहिक निकालें तो क्या एक पृष्ठ का ही निकालें? पत्रिका निकालें या पाक्षिक निकालें? युद्ध के कारण ‘जनता’ के पीछे हर माह 400 रु. की खोट आती है। उसे पूरा कैसे किया जाए? आखिर प्रेस के कुछ लोगों को कम कर जैसे-तैसे माहवार रु. 150 की बचत करने की बात सोची गई। युद्ध के कारण कागज महंगा हुआ है। हो सकता है आगे से वह मिलेगा भी नहीं। हालांकि फिलहाल ‘जनता’ पत्रिका चलाने की बात हमने तय की है। हालांकि अब आप लोगों को पत्रिका की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। यही रूकता हूं और सबके प्रति आभार प्रकट करता हूं।

धन्यवाद अर्पण करते हुए श्री एस. वी. गायकवाड़ ने अपने भाषण में कहा कि अब कुछ बोलने के बजाय अपनी जिम्मेदारी क्या है इस बारे में आप सोचिए।