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बहनों और भाइयों,
आप सभी जानते हैं कि आज की सभा क्यों बुलाई गई है। पिछले साल डेढ साल से सरकार ने हमारे वतनों के संदर्भ में अन्याय की नीति अपनाई है। महार, मांग, वेठिया आदि वतनदारों की जो जमीनें वंश परंपरा से उनके पास हैं, जिन पर उनकी आजीविका निर्भर है उन वतनी जमीनों पर सरकार नया लगान कर वसूल रही है। मेरी जानकारी के मुताबिक 1939 में इस नई नीति के कारण सरकार को अतिरिक्त 1500 से 2000 रुपए मिले। सन् 1940 में यह रकम बढ़ कर 5000 रु. तक पहुंची। सरकार की इस अन्यायपूर्ण नीति के खिलाफ जनमत जागृत कर पिछले वर्ष हरेगांव में मुंबई इलाके के महार, मांग, वेठिया आदि अस्पृश्य वतनदारों की परिषद मेरी अध्यक्षता में हुई थी। उस परिषद में पारित किए गए प्रस्ताव के अनुसार अतिरिक्त लगान की अन्यायकारी नीति के बारे में सरकार को खलिता भेजा जाए। अगर वह नहीं माना गया तो सरकारी कामों का बहिष्कार किया जाए। या फिर प्रतिकार का कोई और तरीका अपनाएं। परिषद के अध्यक्ष के नाते मैंने वह खत गवर्नर को भेजा था। जवाब मिला था कि उस पर सोचा जा रहा है। लेकिन उसके बाद इतनी लंबी अवधि के बाद भी सरकार की नीति में कोई फेरबदल नहीं आया है। बलिक, मैंने सुना है कि, सरकार ने सिन्नर तहसील के कुछ महार वतनदारों पर सरकार ने दीवानी दावे ठोंके हैं। अतिरिक्त लगान की वसूली के लिए पुलिस ने जमीन पर कुर्की लाने की कोशिश की। सरकार की इस नीति के बारे में लोगों में असंतोष फैलाने वालों पर भी कानूनी कार्रवाई करने के बारे में सरकार सोच रही है।
सरकार की यह नीति बेहद अन्यायकारी है। अन्याय अथवा नीति पर आधारित नहीं है। इस अन्यायकारी नीति की खिलाफत के लिए अब हमें तैयार होना पड़ेगा।
वतन का चलन बहुत पुराना है। हिंदुओं के राज्य से वह जारी है। अंग्रेजों की सत्ता आई तब उन्होंने अपनी सहूलियत के अनुसार वतन के अधिकारों में फेर बदलाव किए। महार, मांग, बेठिया आदि लोगों की ही तरह यहां अन्य वतनदार भी हैं। अन्यों के बारे में सरकार ने जो न्यायबुद्धि दिखाई वह हमारे बारे में कभी नहीं दिखाई। इस अन्याय की जानकारी आपको हो इसलिए और दो-चार उदाहरण मैं आपको बताता हूं।
पेशवा काल में ईनामदारों का एक वर्ग था। इस वर्ग को सरकार से हर वर्ष वर्षाशन (सालाना अनाज आदि के लिए दिया जाने वाला अनदान) उनका कोई कामधाम नहीं होता था। इसी प्रकार मंदिर के पुजारियों के भी वतन हुआ करते थे। पेशवा के बाद यहां अंग्रेजी शासन आया तब सरकार ने इन वतनों का क्या किया? पेशवा के समय में जिन्हें इनाम मिला करता था उनके वतनों को सरकार ने छुआ तक नहीं। सरकार को इन लोगों से रत्ती भर का लाभ भी नहीं है फिर भी सरकार ने इनामदारों की 6,15,649 रुपयों को