190 16.8.1941 अंग्रेज सरकार ने हमारे लिए क्या किया? - सिन्नर (नासिक) - Page 355

334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लगान वाली जमीनों को उन्हीं के पास रखा है। दूसरा वतनदार वर्ग जागीदारों का है। इन लोगों को पेशवा ने आय के साधन दिए थे। उस धन से ये लोग सेना पालते और पेशवा को जरूरत पड़ने पर या लड़ाई के दौरान यह सेना पेशवा को देते। लेकिन अंग्रेजों की सेना नीति बिल्कुल अलग है। सेना के मामले में उनमें परावलंविल्व नहीं था। अंग्रेजों की सरकार अपने खर्चे से सेना पालती है। जाहिर है कि पेशवाकालीन जागीरदारों की उपयोगिता खत्म हुई सरकार के लिए उनकी कोई उपयोगिता नहीं रही। इसके बावजूद सरकार ने उनके वतनों को नहीं छेड़ा। इन जागीदारों को बैठे-बिठाए सरकारी तिजोरी से 2,67,500 रु. की पेंशन दी जाती है।

जागरीदार, पुजारी आदि की ही तरह पेशवा युग में देखमुख, देशपांडे आदि लोगों को नौकरी पर खा जाता था। लेकिन उनकी जागीदारें विरासत के अधिकारों से चलती थीं इसलिए सरकार को नहीं चाहिए थीं। मामलतदार या तहसीलदार की नौकरी अगर विरासत में, बिना योग्यता के दी जाए तो राज्य के कामकाज में घपले हो सकते हैं इसलिए तनख्वाह पर मामलतदारों की नियुक्ति की गई। अब पुराने देशमुख - देशपांडे की सरकार को कोई जरूरत नहीं। लेकिन अचरज की बात यह है कि उनके पास की जमीन उनसे लौटा नहीं ली गई। वे उन्हीं के पास रहीं। इतना ही नहीं सरकार उनसे 8,14,545 रु. के लगान की जगह केवल 2 लाख रु. का लगान ही लेती है।

आपकी ही तरह पुराने जमाने में लुहार, बढ़ई, धोबी, नाई आदि बारह लेहनादार काम किया करते थे लेकिन 1873 में सरकार ने उन्हें नौकरी से मुक्त किया। सरकार ने उन्हें उनकी जागरें बहाल कर दीं। आजकल के पटवारियों की जगह पहले जागीर वाले कुलकर्णी हुआ करते थे। सरकार ने कुलकर्णियों की जागीरें खालिसा करवा लीं लेकिन उनके पास की जमीनों को पुराने लगान पर ही फिर उन्हें बहाल कीं। इतना ही नहीं बिना कुछ काम किए उन्हें पहले ही की तरह सालाना तनख्वा भी मिलती है! हमारे जैसे ही जो अन्य ईमानदार, जागीदरदार, माफीदार थे उनके साथ सरकार न्याय और उदार बुद्धि से पेश आई तो फिर हमारे साथ ही क्यों इस तरह का व्यवहार किया? सरकार इन सभी घरघुसरे लोगों को मुफत ही 200000 रुपये बांटती है। और बेचारे महार (ढेंढ), मांग (मातंग, चांडाल) और वेठिया आदि धूप-बारिश की परवाह किए बगैर किए बगैर दिन के चौबीसों घंटे सरकारी कामों में एड़ी-चोटी का पसीना एक करते हैं, उन्हीं के साथ इतना जुल्म, अन्याय क्यों किया जाता है? सरकार से मेरा यही चुनौतीभरा सवाल है।

पिछले दस-पंद्रह सालों से मेरा कटाक्ष स्पृश्य हिंदू और काँग्रेस आदि इस देश के लोगों के खिलाफ था। आज तक मैं हिंदू धर्म और हिंदू समाज पर हमले करता आया हूं। लेकिन मैं सरकार को पक्के तौर पर बताना चाहता हूं कि जितनी चरमला से मैंने हिंदुओं पर हल्ला बोला है उसकी सौ गुना तेज हल्ला में सरकार पर बोलूंगा। मैं कभी भी