191 24.9.1941 अंग्रेजों को बचाने के लिए नहीं, अपना घर बिखर न जाए इसलिए.... - परेल (मुंबई) - Page 360

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दूसरी बात यह है कि, लोग कहते हैं कि, बाइसराय ने डॉ. अम्बेडकर को अपने कार्यकारी मंडल में नहीं लिया, तो हम क्यों पलटन में भर्ती हों? इस बारे में मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि आर-पार की लड़ाई और रूठने में बहुत फर्क है। है ना? अपने प्रतिनिधि को कार्यकारी मंडल में नहीं लिया यह हमारे साथ अन्याय है यह बात मैं भी मानता हूं। सरकार भी यह बात मानती है। खुद मान्यवर वाइसरॉय ने यह बात मेरे सामने कबूली है। एक और बात यह भी है कि अगर सरकार ‘हम करे सो कायदा’ नीति को अपनाए और अभिमान से फूल कर हमसे कहने लगे कि जाओ, जो जितना जैसा आंदोलन करना है, कर लो_ हम तुम्हारे लिए कुछ नहीं करेंगे_ तो हम सरकार का क्या बिगाड़ लेंगे? हमारे पास तो साधन भी उपलब्ध नहीं हैं। हम सरकार से रूठ कर बैठे रहने के अलावा क्या कर सकते हैं? मुझे अपने बचपन का एक वाकया याद आया। हम तीन-चार भाई हमारी बुआ के यहां रहते थे। खाना खाते समय हमेशा इसे ज्यादा मिला, उसे कम मिला। जैसी हमारी नोंक-झोंक चलती रहती थी। शिकायतें भी की जाती थीं। ऐसे झगड़ों में मैं सबसे आगे हुआ करता था। एक बार बुआ ने बैंगन का भरता बनाया था। खाना खाते हुए मैंने शिकायत की कि मुझे भरता कम मिला। उस दिन मेरे भाइयों ने तय किया हुआ था कि मुझे कुछ नहीं मिलने देंगे, इसलिए मेरी शिकायत का कोई फायदा नहीं हुआ। बस मुझे बेहद गुस्सा आया। मैंने रूठ कर खाना खाने से मना किया और बाहर निकल गया। मेरे पीछे मेरे हिस्से जो थोड़ा भरता आया था वह भी मेरे भाई

खा गए। उस पूरे दिन मुझे कुछ खाने को नहीं मिला और खाली पेट ही रहना पड़ा। कहने का मतलब यही कि दोनों पक्ष समान रूप से बलवान हों तभी झगड़ना सही होता है। वरना रूठने में कोई अकलमंदी नहीं ऐसा मुझे लगता है। हमारे पास कोई अधिकार नहीं है। बोलने में और लड़ाई करने में बहुत अंतर है। वाइसराय ने अन्याय किया है कि बात सही होने के बावजूद रूठ कर किसी झोंपडे में बैठे रहने में कोई तुक नहीं है।

मुस्लिम लीग मुसलमानों की बलशाली संस्था है। सांप और नेवले का जिस तरह पैदाइशी आपसी बैर होता है उसी तरह अंग्रेज और इस संस्था के बीच आपसी बैर है। इसके बावजूद मुसलमान लोग जो भी कुछ साध सकते हैं उसके लिए कोशिशें कर वह पा ही रहे हैं। सेना में 80 प्रतिशत मुसलमान लोग है_ 50 प्रतिशत अधिकारी है, 80 से 90 प्रतिशत मिलिट्री कॉट्रॅक्टर्स मुसलमान हैं। यह जमीनी हकीकत है। मुसलमान लोग व्यवहार को ज्यादा महत्व दे रहे हैं, बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। मुसलमान लोग अगर इनकार करते हैं तो अंग्रेजों को उनकी मनुहार करनी पड़ेगी। क्योंकि मुसलमानों के हाथ अब बलवान हैं। हमारे हाल उनके जैसे नहीं है। हम सभी तरफ से दबाए गए हैं। इसके बावजूद उन्होंने हमारी शर्तें मानीं इसी बात का मुझे अचरज लगता है।

इसीलिए कहता हूं इन दो पलटनों में अधिकारियों के पदों पर कब्जा करने के लिए